Comprehension Passage

नीचे दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़े और प्रश्न 21 से 25 तक का सर्वोत्तम उत्तर चुनें।

जेठ की आँच न हो तो आषाढ़ आएगा कैसे? ग्रीष्म ताप के कोड़ों से जब समुद्र को जगाता है तो उसके आँसू बादल बनते और आकाश में छा जाते हैं। हवा का रथ उन्हें ले जाता है पर्वत पर, वन-प्रांतर में, नदी-पोखर में, मनुष्य के भीतर बढ़ते हुए पठार में। धरती अन्न-जल से भर जाती है, पर्वत पर झरनों का जन्म होता है, झरने मिल कर नदी की रचना करते हैं। वह सबको सींचती हुई, प्यास बुझाती हुई, फिर सागर के पास चली जाती है। पूरा जीवन-चक्र समाया हुआ है ऋतु चक्र में। आषाढ़ की पूर्णिमा में चंद्रमा का घट अमृत से भर जाता है और वह सवन करता हुआ, उफनता हुआ पृथ्वी पर गिरने लगता है। सवन से गिरी हुईं अमृत की बूँदे उत्सव की रचना करती हैं। सवन से शब्द बना है 'उत्सव'। और जीवन, उत्सव नहीं तो और क्या है? आषाढ़ से ही शुरू होती है वह लीला, जिसमें राग-विराग, भक्ति-ज्ञान, धर्म-विज्ञान, सागर-पर्वत सबका भेद मिट जाता है। यह वर्षा-राग है जो लोक-परलोक के भेद को भी मिटा देता है। मेघों से टूट रहा है हमारा संवाद। बँटे हुए जन-मन पर वे अब भी बरसते हैं लेकिन सातत्य के साथ नहीं, रुक-रुक कर। कहीं बाढ़ आकर सब बहा ले जा रही है, कहीं लोग प्यास से मर रहे हैं। अतिवृष्टि और अनावृष्टि दोनों ओर प्रलय मृत्यु-राग, बजा रहे हैं वही मेघ। उनके जल को ग्रहण करने के लिए हमारे पास जगह ही कहाँ है? अँजुरी भी कहाँ खाली है कि वे बरसें और सारे भेद मिटा कर सब एक कर दें। थोड़ी जगह दें बादलों को उतरने के लिए। नहीं देंगे तो जल जीवन नहीं; जहर बनकर हमको मारेगा और बाढ़ बन कर हमारी बस्तियाँ बहा देगा। जगह देंगें तो बौछार, झड़ी और रिमझिम बन कर आस्था के कुंभ को भरता रहेगा, संस्कृतियों की रचना करने वाली नदियों को सदानीरा बनाते हुए उनके प्रवाह को रुकने नहीं देगा। पहले नदियाँ जब अपने तटबंध तोड़ देती थीं तो हम उनकी पूजा करके उन्हें मनाते थे। गंगा, यमुना, नर्मदा, कावेरी, गोदावरी, सरयू का क्रोध उतारने के लिए क्या किसी ने तट पर खड़े होकर आरती की? नहीं की, तो क्यों?

प्रस्तुत गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक क्या होगा?

1
जेठ की आंच
2
आषाढ़ की पूर्णिमा
3
बादलों को उतरने के लिए थोड़ी जगह दें
4
वर्षा राग

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