हास्य रस किस पंक्ति में हैं?

1
फहरी ध्वजा, फड़की भुजा, बलिदान की ज्वाला उठी।
निज जन्मभू के मान में, चढ़ मुण्ड की माला उठी।
2
ऐसी मूढता या मन की।
परिहरि रामभगति-सुरसरिता, आस करत ओसकन की।।
3
आगे चले बहुरि रघुराई ।
 पाछे लरिकन धुनी उड़ाई।।
4
शव जीभ खींचकर कौवे, चुभला-चभला कर खाते।
5
हे आर्य, रहा क्या भरत-अभीप्सित अब भी?
मिल गया अकण्टक राज्य उसे जब, तब भी?

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