हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली कड़ी परीक्षा तब हुई जब भाषा पर आधारित राज्यों का गठन हुआ। ऐसा इसलिये किया गया ताकि एक ही भाषा बोलने वाले लोग एक ही राज्य में रह सकें। कुछ राज्यों का गठन भाषा के आधार पर नहीं बल्कि भूगोल, जातीयता, संस्कृति, आदि के आधार पर हुआ; जैसे नागालैंड, उत्तराखंड और झारखंड। भारतीय संघ की दूसरी परीक्षा थी यहाँ की भाषा नीति। हमारे संविधान ने किसी भी भाषा को राष्ट्र भाषा का दर्जा नहीं दिया है। हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता मिली। लेकिन हिंदी केवल 40% भारतीयों की मातृभाषा है। इसलिये दूसरी भाषाओं की रक्षा के लिये कई प्रावधान बनाये गये। हिंदी के अलावा, 21 अन्य भाषाओं को संविधान द्वारा अनुसूचित भाषा का दर्जा दिया गया है। आजादी के बाद के अधिकांश समय में हिंदी को गैर-हिंदी क्षेत्रों में थोपे जाने की कोशिश नहीं की गई।
केंद्र और राज्य के रिश्ते: केंद्र और राज्य के बीच के रिश्तों के पुनर्गठन से हमारी संघीय व्यवस्था को और बल मिला है। आजादी के बाद एक लंबे समय तक भारत के ज्यादातर हिस्सों में केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार हुआ करती थी। उन दिनों भारत में कांग्रेस की मोनोपॉली चलती थी। इन दिनों में केंद्र सरकार अक्सर राज्य सरकार के अधिकारों की अवहेलना करती थी। राज्य सरकार द्वारा जरा-सी भी स्वग्रहिता दिखाने पर कई राज्यों पर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाता था।
1989 के बाद से केंद्र में गठबंधन सरकार का दौर चला। इसके परिणामस्वरूप राज्य सरकार की स्वायत्तता के सम्मान और सत्ता में साझेदारी की नई परिपाटी शुरु हुई। ऐसा कहा जा सकता है कि अब भारत में संघीय व्यवस्था कहीं अधिक प्रबल हुई है। 1991 की जनगणना के अनुसार भारत में 1500 अलग-अलग भाषाएँ हैं। इन भाषाओं को कुछ मुख्य भाषाओं के समूह में रखा गया है। उदाहरण के लिये भोजपुरी, मगधी, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, भीली और कई अन्य भाषाओं को हिंदी के समूह में रखा गया है। विभित्र भाषाओं के समूह बनाने के बाद भी भारत में 114 मुख्य भाषाएँ हैं। इनमें से 22 भाषाओं को संविधान के आठवें अनुच्छेद में अनुसूचित भाषाओं की लिस्ट में रखा गया है। अन्य भाषाओं को अ-अनुसूचित भाषा कहा जाता है।
उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्न का उत्तर बताइए।