Comprehension Passage
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गये प्रश्नों में सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए।
रामेश्वरम् मंदिर के पुजारियो के मुखिया पक्षी लक्ष्मण शास्त्री मेरे पिताजी के घनिष्ठ मित्र थे। अपने बचपन की यादों में मुझे सबसे अच्छी तरह याद हैं कि दोनों अपनी पारंपरिक वेशभूषा में आध्यात्मिक मामलों पर चर्चाएँ करते रहते थे। जब मैं प्रश्न पूछने लायक बड़ा हुआ तो मैंने पिताजी से प्रार्थना की प्रासंगिकता के बारे में पूछा। पिताजी ने मुझे बताया कि प्रार्थना में रहस्यमयी कुछ भी नहीं है। अपितु प्रार्थना से लोगों के बीच भाईचारे की भावना संभव हो पाती है। वे कहते "जब तुम प्रार्थना करते हो तो तुम अपने शरीर से इतर ब्रह्मांड का एक हिस्सा बन जाते हो; जिसमें दौलत, आयु या धर्म-पंथ का कोई भेदभाव नहीं होता।" मेरे पिताजी अध्यात्म की जटिल अवधारणाओं को भी तमिल में बहुत ही सरल ढंग से समझा देते थे। यही उनकी अग्रगामी सोच का परिपाक था। एक बार उन्होंने मुझसे कहा, 'उस वक्त में, उस स्थान पर, जो वे वास्तव में हैं और जिस अवस्था में पहुँचे हैं अच्छी या बुरी- हर इनसान दैवी शक्ति रूपी ब्रह्मांड में एक विशेष हिस्से के रुप में होता है तो हम संकटों, दुःखों या समस्याओं से क्यों घबराएँ? जब संकट या दुःख आएँ तो उनका कारण जानने की कोशिश करनी चाहिए। विपत्ति हमेशा आत्मविश्लेषण के अवसर प्रदान करती है।'
रामेश्वरम् मंदिर के पुजारियो के मुखिया पक्षी लक्ष्मण शास्त्री मेरे पिताजी के घनिष्ठ मित्र थे। अपने बचपन की यादों में मुझे सबसे अच्छी तरह याद हैं कि दोनों अपनी पारंपरिक वेशभूषा में आध्यात्मिक मामलों पर चर्चाएँ करते रहते थे। जब मैं प्रश्न पूछने लायक बड़ा हुआ तो मैंने पिताजी से प्रार्थना की प्रासंगिकता के बारे में पूछा। पिताजी ने मुझे बताया कि प्रार्थना में रहस्यमयी कुछ भी नहीं है। अपितु प्रार्थना से लोगों के बीच भाईचारे की भावना संभव हो पाती है। वे कहते "जब तुम प्रार्थना करते हो तो तुम अपने शरीर से इतर ब्रह्मांड का एक हिस्सा बन जाते हो; जिसमें दौलत, आयु या धर्म-पंथ का कोई भेदभाव नहीं होता।" मेरे पिताजी अध्यात्म की जटिल अवधारणाओं को भी तमिल में बहुत ही सरल ढंग से समझा देते थे। यही उनकी अग्रगामी सोच का परिपाक था। एक बार उन्होंने मुझसे कहा, 'उस वक्त में, उस स्थान पर, जो वे वास्तव में हैं और जिस अवस्था में पहुँचे हैं अच्छी या बुरी- हर इनसान दैवी शक्ति रूपी ब्रह्मांड में एक विशेष हिस्से के रुप में होता है तो हम संकटों, दुःखों या समस्याओं से क्यों घबराएँ? जब संकट या दुःख आएँ तो उनका कारण जानने की कोशिश करनी चाहिए। विपत्ति हमेशा आत्मविश्लेषण के अवसर प्रदान करती है।'
गद्यांश में कौनसा शब्द "आगे निकलने" का अर्थ है?
1
सन्दर्भ
2
आत्मविश्लेषण
3
अग्रगामी
4
अवसर