इस गद्य को ध्यान से पढ़े और नीचे दिए गए प्रश्न का उत्तर दें:
साहित्य,भाषा और समाज का अत्यंत घनिष्ट सम्बन्ध रहा है। समाज के चित्तवृत्ति के परिवर्तन का प्रभाव साहित्य और उसकी भाषा पर भी पड़ता है। यह प्रभाव साहित्यिक विधाओं का रूप परिवर्तन भी तय करता है। हमारे वैदिक पौराणिक परंपरा में जहाँ संवादों महाकाव्यों का महत्त्व रहा है, वही आज साहित्य का रूप बहुत बदल चुका है। आख्यायिका परंपरा का साहित्य आज निबंध,कहानी,कथा उपन्यास आदि जैसे अनेक विधाओं में परिवर्तित हो चुका है यह परिवर्तन सामाजिक चित्तवित्त में होने वाले परिवर्तन के कारण ही होता है। समाज की भावदषा एवं मनोदषा में परिवर्तन के साथ-साथ भाषा का रूप भी परिवर्तित होता रहता है।
साहित्य,भाषा और समाज के इन्ही संबंधों के परिणामस्वरूप भाषा भी अपनी यात्रा तय करती है। अपनी आरम्भिक रूप से लेकर अब तक हिंदी भाषा के रूप में अनेक परिवर्तन हुए है। यह परिवर्तन काव्य-भाषा एवं गद्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठा के साथ-साथ सूक्ष्म भावात्मक अभिव्यक्ति की भाषा के रूप में भी दृष्टिगत होती है। गद्य भाषा के रूप में सर्वाधिक वैविध्यपूर्ण रूप औपन्यासिक भाषा का है। औपन्यासिक भाषा में काव्य-भाषा की भावुकता,निबंध भाषा की विचारात्मकता,जीवनी का माधुर्य, नाट्य भाषा की प्रत्युत्पन्नता के साथ-साथ देषकाल एवं परिवेष का चित्रण भी दृष्टिगत होता है।
हिंदी की वर्तमान औपन्यासिक परंपरा का आरम्भ “परीक्षागुरू” उपन्यास से माना जाता है। परीक्षागुरू उपन्यास की भाषा भी सामान्य वर्णात्मक स्तर की है। हिंदी औपन्यासिक परंपरा में कथा सम्राट प्रेमचंद्र का विशेष स्थान है। प्रेमचंद्र ने सामान्य जन की भाषा को अपने उपन्यास के फलक पर उतारने का काम किया। प्रेमचंद्र के ही समकालीन कथाकारों में जैनेन्द्र मनोविश्लेषणवादी कथाकार थे। जैनेन्द्र ने औपन्यासिक भाषा को भाषा के वर्णात्मक स्तर से ऊपर उठाया। जैनेन्द्र हिंदी के ऐसे कथाकार के रूप में जाने जाते है जिनकी भाषा में कविता, निबंध,नाटक एवं आत्मकथात्मक तीनो शैलियों का प्रयोग देखा जा सकता है।
उपरोक्त गद्यांश में प्रयुक्त शब्द “चित्तवृत्ति” का शाब्दिक अर्थ क्या होता है?