एक था किसान। गोमा मोरी नाम था उसका। गुजर-बसर लायक खेती थी। एक गाय, एक जोड़ी बैल, बीस बकरियाँ थीं। छोटा-सा घर। घर के सामने पशु बाँधने का बाड़ा। तीन साल से वर्षा बहुत कम हुई थी। न फसले हुई थीं न चारा। इस वर्ष भी आषाढ़ सूखा ही रह गया। वर्षा की कोई आशा नहीं बंधी थी। "खेत जोतकर क्या करूँगा?" गोमा ने एक लम्बी सांस छोड़ी और मन ही मन सोचा। वह बैलों को हाँकते हुए वापिस घर की ओर चल पड़ा। अगले दिन गोमा बड़े सवेरे सोकर उठा। गाय, बैल व बकरियों को बाड़े से निकाला। उसकी पत्नी बकरियों को घेरकर उन्हें चराने चली गई। उसने फिर हिम्मत बटोरी और हल को बैलों के कंधे पर रखकर चल पड़ा खेतों की ओर। रास्ते में उसे कई किसानों ने टोककर कहा कि "गोमा! खेत जोतने से क्या होगा? वर्षा के तो कुछ भी आसार नहीं दिख रहे।" गोमा ने सब की बात सुनी। कई बार उसका मन डाँवाडोल भी हुआ फिर भी उसने हिम्मत रखी और कुछ सोचकर खेत पर पहुँच गया।
उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्न का उत्तर बताइए।