निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्न के उत्तर दीजिए ।
‘एक साधारण किसान से लेकर बड़े-बड़े विज्ञान-वेत्ताओं तक की सफलता का मूल कारण परिश्रम ही है। जो कार्य बड़े कठोर, भयंकर दिखाई देते हैं, परिश्रम रूपी मंत्र से, उन सबके आगे असफलता का भूत टिक ही नहीं सकता। जो परिश्रम के लिए कमर कस लेता है, उसकी विजय होने में कोई संदेह नहीं रह सकता। सफलता रूपी विजय-शक्ति चाहे कहीं भी छिपी हो, उसे परिश्रमी व्यक्ति के पास आना ही पड़ता है। प्रभु भी परिश्रमी की ही सहायता करता है।पूरे मनोयोग से किया हुआ परिश्रम मनुष्य को अपने ध्येय तक पहुँचा देता है। गेहूँ आदि उपजाने के लिए किसान को कितना कठोर परिश्रम करना पड़ता है। इसी प्रकार ज्ञान और विज्ञान के कार्यों में भी परिश्रम का ही पूरा हाथ है। एक विज्ञानवेत्ता को नई खोज करने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ता है; ना रात का पता, न दिन का, न भूख का, न प्यास का । जब उसे अपने कार्य में सफलता मिल जाती है तो उसके आनंद का ठिकाना नहीं रहता। विद्यार्थी जीवन की ओर दृष्टि दौड़ाएँ तो उसमें भी यही सार है। परीक्षा सर पर आती है तो परीक्षार्थी को कुछ नहीं सूझता । वह अपना सारा आराम और सुख की नींद छोड़कर, मस्तिष्क के द्वार खोलकर, कठिन परिश्रम के लिए कटिबद्ध हो जाता है। पूरे दिल से परिश्रम करके परीक्षा देता है। तब उसको आत्मविश्वास होता है कि उसके पास एक ऐसी कुंजी है जिसके द्वारा उसने सफलता रूपी मंदिर का द्वार खोल कर, उस अक्षय भंडार के दर्शन कर लिए हैं जो कि कभी कम नहीं होता। परिश्रम करने से उसमें से न जाने कितने अमूल्य रत्न प्राप्त हो सकते हैं। सचमुच इसी परिश्रम रूपी कुंजी को लेकर मनुष्य उस भव्य प्रासाद के ताले खोल सकता है जिस में न जाने कितनी अमूल्य निधियाँ भरी पड़ी हैं। '