निर्देश: निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए व प्रश्नों के उत्तर दीजिये -
लोक की व्यापक भावसत्ता को ग्राम या नगर की संकुचित सीमा में बद्ध नहीं किया जा सकता। इस संबंध में डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन है कि ‘लोक’ शब्द का अर्थ ‘जनपद’ या ‘ग्राम्य’ नहीं है। बल्कि नगरों और ग्रामों में फैली समस्त जनता है जिसके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं। ये लोग नगर में परिष्कृत रुचि संपन्न सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यासी होते हैं तथा परिष्कृत रुचि संपन्न व्यक्तियों की विलासिता और सुकुमारता को जीवित रखने वाली आवश्यक वस्तुएँ उत्पन्न करते हैं। डा. द्विवेदी के इस कथन से स्पष्ट है कि जो अपनी परंपराओं से जुड़े हुए कृत्रिमता से दूर हैं उन्हें ‘लोक’ की संज्ञा दी गई है। लोक की परंपरा, संस्कृति, विचार, रीति-रिवाज आदि को संरक्षित और संवर्धित करने वाले साहित्य को ही लोक साहित्य कहा जाता है। जनजीवन के सहज स्वाभाविक और सच्चे चित्रण का आधार यही साहित्य है। सामान्य जन समूह ,जो अपनी नैसर्गिक प्रकृति के सौन्दर्य से संस्कृति का निर्माण करता है, लोक साहित्य की अभिव्यक्ति का आधार है। उच्चवर्गीय शिष्ट समाज ने अपने कृतित्व को लिपिबद्ध किया और अध्ययन-अध्यापन की परंपरा द्वारा समस्त अर्जित ज्ञान को सुरक्षित और संरक्षित रखने का प्रयास किया।