Comprehension Passage

निर्देश: निम्नलिखित गद्याशं को पढ़कर 22-26 तक प्रश्नों के उत्तर दीजिये-

यह भी एक अजीब विडंबना थी कि इतिहास के प्रति अरुचि को हिंदुओं की आध्यात्मिकता के प्रति अपवाद रूप से अत्याधिक रुचि के आधार पर व्याख्यायित किया गया। सीधे सीधे यह तर्क दिया गया कि दुनिया की अन्य सभ्यताओं व संस्कृतियों की तुलना में विशिष्ट रूप से लोकोत्तर जीवन और पारलौकिक विश्वासों पर उनके जीवन और समस्त बौद्धिक चिंतन के केंद्रित होने के कारण ही भारत में इतिहास लेखकों एवं इतिहास की प्रामाणिक रचनाओं का अभाव रहा है। यह एक कोरा सरलीकरण था और भारत में इतिहास के प्रति अरुचि के कारणों को सही ढंग से सामने रखने के स्थान पर उस समय आने वाले यूरोपीय यात्रियों की भारत के सांस्कृतिक अतीत के संबंध में नासमझी को अधिक प्रकट करता है। कौटिल्य, वात्स्यायन, अश्वघोष और चार्वाक आदि की रचनाएँ जिस देश में मौजूद रही हों वहाँ आध्यात्मिकता को उसका केंद्रीय सांस्कृतिक मूल्य बताना यथार्थपरक दृष्टि का सूचक कम और राजनीतिक दृष्टि का सूचक ज्यादा था। हालाँकि विलियम जोन्स के समय से ही भारत के बारे में इस साम्राज्यवादी निष्कर्ष का खंडन भी होने लगा था कि पश्चिमी पुनर्जागरणकालीन मूल्यों के गर्भ से उपजी जिस आधुनिकता का संवाहक यूरोप है, उसके सामने भारतीय सभ्यता और संस्कृति तथा उपलब्धियाँ कहीं नहीं ठहरतीं। विलियम जोन्स ने भारतीय संस्कृति की महान उपलब्धियों के रेखाँकन के बहाने पश्चिमी पुनर्जागरण और एशियाई जड़ता की रूढ़ दृष्टियों पर आधारित द्वंद्व के बारे में लिखा-'हमें एशियाई लोगों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए, जिनकी प्रकृति, कला, आविष्कार से अपने विकास और लाभ के लिए अनेक महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त कर सकते हैं।' 

पश्चिमी पुनर्जागरण और एशियाई जड़ता की रूढ़ दृष्टियों के बारे नें किसने लिखा है?

1
कौटिल्य
2
वात्स्यायन
3
विलियम जोन्स
4
अश्वघोष

Sponsored

hivanix.in

Visit

This quiz is brought to you by hivanix.in

🌐 Web App Development

Quick Navigation