निर्देश: गद्याशं को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिये-
पूर्वोत्तर भारत की जनजातीय लोकभाषाओं के संरक्षण के लिए इन भाषाओं में उपलब्ध वाचिक साहित्य, ज्ञान एवं अनुभवों का संकलन, संचयन, संपादन एवं प्रकाशन अत्यंत आवश्यक है। साथ ही कोश निर्माण, व्याकरण निर्माण, विश्वकोशों का निर्माण आदि ठोस कदम भी यथाशीघ्र उठाने होंगे। इस संदर्भ में केंद्रीय हिंदी संस्थान, गुवाहाटी केंद्र के निदेशक ने एक विचारोत्तेजक आलेख 'उपेक्षित प्रश्न : जनजातीय भाषा सर्वेक्षण, संरक्षण' में यह सुझाव दिया है कि सबसे पहले तो जनजातीय लोकभाषाओं का सर्वेक्षण आवश्यक है जो कि 1971 के बाद हुआ ही नहीं है। कैसी विडंबना है कि आज लुप्तप्राय भाषाओं पर काम करने के लिए करोड़ो-करोड़ सरकारी धनराशि विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से खर्च की जा रही है, इससे संबंधित विभाग और केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं लेकिन जहाँ तक मेरी जानकारी है अभी तक किसी भी केंद्र ने भाषा-सर्वेक्षण करके इन भाषाओं की सही संख्या पता करने या उनके बारे में विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करने की कोशिश नहीं की है। वे पूर्वोत्तर भारत की जनजातीय लोकभाषाओं के उत्थान के लिए यह भी प्रस्तावित करते हैं कि इस क्षेत्र में केंद्रीय जनजातीय भाषा अनुसंधान केंद्र, केंद्रीय जनजातीय भाषा-साहित्य अकादमी, पूर्वोत्तर भारत केंद्रीय जनजातीय भाषा अकादमी, पूर्वोत्तर भारत जनजातीय भाषा विश्वविद्यालय की स्थापना तो जरूरी है ही, साथ ही पूर्वोत्तर भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में यहाँ कि लुप्तप्राय भाषाओं का अध्ययन-अध्यापन भी जरूरी है।