नीचे दिये गए गद्यांश को पढ़कर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
गाँधीजी की दृष्टि में संसार की सभी समस्याएँ उसमें बसनेवाले व्यक्तियों की समस्याएँ हैं और इन समस्याओं के समाधान का मार्ग व्यक्ति के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने का मार्ग है। संस्कृति के विषय में कहा जाता है कि हम एक संस्कृति को विनष्ट करके दूसरी संस्कृति का प्रचार नहीं कर सकते, क्योंकि संस्कृति विनष्ट नहीं, रूपांतरित होती है। गाँधीजी भी एक समाज को विनष्ट करके दूसरे समाज की स्थापना की कल्पना नहीं करते, प्रत्युत, उसका रूप बदल देना चाहते हैं। जमे हुए पानी को वे उलीचकर फेंकना नहीं चाहते, बल्कि वे बहने का मार्ग बताकर उसे स्वयं कम करने देने के पक्षपाती हैं। यह भी एक प्रकार की क्रांति है और सफल हो तो, शायद, मार्क्सवादी क्रांति की अपेक्षा यह अधिक दीर्घायु भी हो सकती है। किंतु, इस क्रांति की प्रक्रिया दमन और निर्दलन नहीं, प्रत्युत, मूल्यों में परिवर्तन लाना है। अंतिम ध्येय के क्षेत्र में भी गाँधीजी और मार्क्स एक दूसरे से दूर नहीं हैं। दोनों का ही कहना है कि मनुष्य को एक शासनहीन समाज चाहिए।
संस्कृति के सन्दर्भ में कौन सा कथन सत्य है ?