Comprehension Passage

निम्न अनुच्छेद को पढ़कर दिए गए प्रश्न के उत्तर विकल्पों में से चुनकर दीजिए ।

निंदा की ऐसी ही महिमा है। दो-चार निंदको को एक जगह बैठकर निंदा में निमग्न देखिए और तुलना कीजिए, दो चार ईश्वर भक्तों से जो रामधुन गा रहे हैं। निंदको की-सी एकाग्रता, परस्पर आत्मीयता, निमग्नता भक्तों में दुर्लभ है। इसलिए संतों ने निंदको को “आंगन कुटी छवाय" पास रखने की सलाह दी है कुछ मिशनरी निंदक मैने देखे हैं। उनका किसी से बैर नहीं, द्वेष नहीं। वे किसी का बुरा नहीं सोचते पर चौबीस घंटे वे निंदा-कर्म में पवित्र भाव से लगे रहते हैं। प्रसंग आने पर ये अपने बाप की पगड़ी भी उसी आनंद से उछालते हैं, जिस आनंद से अन्य लोग दुश्मन की निंदा इनके लिए टॉनिक होती है। ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निंदा भी होती है। लेकिन इसमे वह मजा नहीं जो मिशनरी भाव निंदा करने में है। निंदकों को दंड देने की जरूरत नहीं वे खुद ही दंडित होते हैं। आप चैन से सोइए, वह जलन के कारण सो नहीं पाता। ईर्ष्या-द्वेष से चौबीसों घंटे जलता है और निंदा का जल छिड़ककर कुछ शांति अनुभव करता है। ऐसा निंदक बड़ा दयनीय होता है। अपनी अक्षमता से पीड़ित वह बेचारा दूसरे की सक्षमता के चाँद को देखकर सारी रात श्वान जैसा भौंकता है। उसे और क्या दंड चाहिए? निरंतर अच्छे काम करते जाने से उसका दंड भी सख्त होता जाता है, जैसे-एक कवि ने एक अच्छी कविता लिखी, ईष्याग्रस्त निंदक को कष्ट होगा। अब अगर एक और अच्छी कविता लिख दी, तो उसका कष्ट दुगुना हो जाएगा।

क्यों निंदक का कष्ट बढ़ता जाता है?

1
वह दूसरे की सफलता से ईष्याग्रस्त रहता है।
2
वह बेचारा दूसरे की सक्षमता से जलता है।
3
विकल्पों में से सभी
4
वह अपनी अक्षमता से पीड़ित होता है।

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