निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दें।
'मेवाराम आज कैंटीन में कुछ अतिरिक्त खुश और आह्लादित दिख रहे थे, जैसे उनके चेहरे से कुछ छलक पड़ना चाहता हो। पलकधारी, खेलावन, दुल्ली, प्रमोद और सुरेश सभी पास बैठे चाय पी रहे थे। पलकधारी ने ताड़ लिया, 'क्या बात है मेवा भाई, आपकी आँखें आज कुछ ज्यादा ही चंचल दिख रहीं हैं?'
मेवाराम जैसे इसी इंतज़ार में थे, झट शुरू हो गए, 'कल मैं पुस्तक मेला चला गया था। वहाँ से तीन-चार बेहद अच्छी पुस्तकें खरीदी, एक तो रात में ही पढ़ ली, मजा आ गया।' रामधन ने बडे अचरज से पूछा, 'ये पुस्तक मेला कैसा होता है मेवा भाई?' मेवाराम हैरत से उसका मुँह देखते रह गए कि 17 साल से इस शहर में पुस्तक मेला लग रहा है और अब तक तुम ने एक बार भी इसे नहीं देखा! वहाँ बैठे सभी को बगलें झांकते देख मेवाराम ने समझ लिया कि ये सभी आज तक वहाँ नहीं गए। मेवाराम को लगा अपना सिर पीट लें। चाय का स्वाद बेमजा हो गया था। उन्होंने सब पर तरस खाते हुए कहा, 'किताबें ही हैं जो किसी को महात्मा गांधी बना देती हैं तो किसी को विवेकानंद। आदमी को अगर चलते जाना है, रुक नहीं जाना है, नित नए होते बदलावों और बदलते समय की धड़कन को सुनते रहना है तो इन किताबों से सम्बन्ध बनाए रखना बहुत जरूरी है दोस्तों।'
पास की टेबल पर डी ब्लास्ट ब्लाक फर्नेस का मुचकुन बैठा चाय पी रहा था। उसने कहा, 'माफ़ कीजिएगा मेवा भाई, आपके कहने पर एक बार मैंने पुस्तक मेले से कुछ किताबें खरीदी थीं, आपको याद है न?'
मेवाराम को वह घटना याद आ गई। मुचकुन के जाने पर उसने सभी को बताया कि कैसे घर लौटने पर मुचकुन की पत्नी सभी किताबें उठा-उठा कर खिड़की से बाहर फेंकने लगी थी, 'पैसा क्या फालतू हो गया है कि बकवास चीजें खरीद लाते हो? रद्दी में तीन रुपये किलो भी मुआ नहीं खरीदता कोई। घर का काम तो ढंग से होता नहीं कोई, उम्र भर किताबें पढ़ते रहोगे।' मेवाराम ने आगे बताया कि मुचकुन के तीन चार जवान बेटे-बेटियाँ हैं लेकिन किसी को ढंग का कैरियर नहीं मिला, शायद उस घर में किताबों की यह दुर्गति और कमी ही इसका मूल कारण हो।'
मेवाराम बात ही कर रहे थे तभी उनकी नजर कोक प्लांट के बरुण चटर्जी पर पड़ गयी। मेवाराम ने उससे बुलाकर पूछ लिया, 'बरुण दा, आप पुस्तक मेले जा रहे हैं या नहीं?' बरुण ने कहा, 'मेवा भाई, पुस्तक मेला लगने पर, मेरे लिए हर शाम वहाँ जाने से अच्छा कुछ काम नहीं होता। किताबें छूते ही ऐसा लगता है जैसे वे मुझसे बातें करने लग गयीं।' खेलावन ने टोका, अरे दादा कुछ खरीदते भी हैं या सिर्फ बातें करके चले आते हैं।' उसने बताया कि जितना बजट है उतना तो खरीदना ही है।
फिर सब भौंचक! किताबों का भी कोई बजट होता है क्या! 'हाँ भाई, जैसे कपड़ा, भोजन, भ्रमण आदि का बजट होता है वैसे ही साल में किताबें खरीदने का भी बजट रखते हैं। साल में दो हज़ार की किताबें तो खरीदता ही हूँ।' सब भौचक होकर सोच रहे थे कि उनके घर में तो किताब रखने की जगह ही नहीं है। वाशिंग मशीन. रंगीन टी.वी., फ्रिज, माइक्रोवेव तक है। मेवाराम और बरुण दा की तरह महँगे सूट पहनने की नक़ल तो हम करते हैं लेकिन उनके घर में किताबें है, उनको खरीदने-पढ़ने की अच्छी आदत की नक़ल करने की हमने कभी नहीं सोची।'