बबूल मेरे जीवन के अनेक जीवित संदर्भों और अनुभवों से गूँथा है। एक दृश्य उभरता है बचपन का - मैं अपने खेतों को पहचानने में अक्सर भटक जाया करता था, लेकिन बबूल के पेड़ खड़े थे, उन्हें फौरन पहचान लेता था। उन बबूलों को अनेक मौसमों में, अनेक फसलों में, अनेक मनःस्थितियों में देखा है। फसल जवानी में होती, हम बबूल के नीचे बैठकर रखवाली करते, चिड़ियों को उड़ाते और दोस्तों को इकट्ठा कर कहानियाँ सुनते-सुनाते राजा-रानी की कहानियाँ, हिरन और चूहे की दोस्ती की कहानियाँ, अनाथ ईमानदार बच्चों की कहानियाँ, जंगल की कहानियाँ, खेत की कहानियाँ, दया, न्याय और सत्य की कहानियाँ...। बबूल अपनी छाँह फैलाए सब सुनता रहता, और बया बड़े विश्वास के साथ उस पर अपना घोंसला बनाया करती। हम लोग बया के लटके हुए सुंदर-मजबूत घोंसलों को देखते और समझ नहीं पाते कि बया ऐसे सुंदर घोंसले बबूल पर ही क्यों बनाती है! ... खेलते-खेलते मैंने कई बार बबुरी की माला बनायी थी, और बचपन के मासूम गले में पहनाई थी। खेलते-खेलते उसके काँटे तलवों में गड़े हैं, जिन्हें लिए हुए घर आया हूँ और माँ ने बड़े प्यार भरे हाथों से धीरे-धीरे निकाला है। माँ नहीं है आज, लेकिन उसके स्पर्श हर काँटे के साथ तलवों में सरसरा रहे हैं। आज पाँव में काँटे नहीं गड़ते। हमेशा जमीन और पाँव के बीच एक दूरी बनी रहती है, जूते की। कोई किसी का काँटा नहीं निकाल सकता। अपने-अपने टूटे काँटे लिए सभी बंद कमरों की तरह घूमते रहते हैं। अजनबी अपने से, दूसरों से।
मेरे खेतों के बबूलों ने मुझे कई बार रुलाया है, कई बार मेरे कपडे फाड़े हैं, मेरे अंग नोचे हैं - लेकिन वह हमेशा मेरे करीब होते गए हैं, मुझमें खुलते गए हैं। जब बरसात में मेरे खेत पानी से भर जाते, धान के पौधे भीगी हवा के झोंकों में काँपने लगते, तो पीले-पीले फूलों से लदे बबूल की छाया पानी में झरती रहती, और मैं देखता रहता। मैंने अपने खेतों के इन बबूलों की डालियों को कई बार कटते हुए देखा है - दादी मरी है, दादा मरे हैं, माँ मरी है, बहन मरी है; और हर बार इस हमदर्द साथी ने अपनी डालियाँ लुटाई हैं। कटकर आधा हुआ है, फिर पनपा है। कटकर कभी मुरझाया नहीं है, चुका नहीं है; बल्कि अपने को हमारे जीवन में व्याप्त कर व्यापक बनाया है- एक-एक संवेदना को छुआ है- कभी काँटों से, कभी फूलों से। इन सारे खेतों में वह डूबा है, फैला है। फावड़ा खेतों की जड़ता तोड़ रहा है, फसल उगाने को। फावड़ा में बेंट बनकर बबूल उगा है। हँसिए फसलें बटोर रहे हैं, बबूल उनकी बाँह बनकर उन्हें पकड़े हुए हैं। छोटे-छोटे खटोले, जो मेरी कितनी ही नींद और स्वप्नों के साक्षी हैं, बबूल से ही बने हुए हैं। पता नहीं वे बबूल अब खेतों में हैं कि नहीं?