निर्देशः महाकवि विद्यापति की रचनाएं संस्कृत, अवहट्ठ और मैथिली - तीनों ही भाषाओं में उपलब्ध हैं। वे कर्मकाण्ड, धर्मशास्त्र, दर्शन, न्यास, सौन्दर्य-शास्त्र आदि के प्रकाण्ड पण्डित थे। उनकी रचनाओं के विपुल भण्डार से उनके ज्ञानफलक का अनन्त विस्तार स्पष्ट होता है। भक्ति रचना, श्रृंगारिक रचनाओं में मिलन-विरह के सूक्ष्म मनोभाव, रति-अभिसार के विशद चित्रण, कृतित्व वर्णन से राजपुरुषों का उत्साह वर्द्धन और नीति-शास्त्रों द्वारा उन्हें कर्तव्यबोध देना, सामान्य जन-जीवन के आहार-व्यवहार की पद्धतियाँ बताना तथा हर क्षेत्र की समीचीन जानकारियाँ उनकी कालजयी रचनाओं में दर्ज हैं। शास्त्र और लोक के संपूर्ण संसार पर उनका असाधारण अधिकार था। ओइनवारवंशीय अनेक राजाओं के शासनकाल में रचित उनकी समस्त कृतियाँ उनके अथाह ज्ञान और दूरदर्शिता का प्रमाण है। सहवर्ती राजाओं की शासन-पद्धति में वे सतत अपना मार्गदर्शन देते रहे। दरबार-सम्पोषित होने के बावजूद उनका एक भी रचनात्मक उद्यम कहीं चारण-धर्म में लिप्त नहीं हुआ। अपनी हर रचना से उन्होंने समकालीन चिन्तक,सामाजिक अभिकर्ता और राजकीय सलाहकार की प्रखर नैतिकता का निर्वहन किया।
उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्न का उत्तर बताइयेः