'प्रेमचंद के फटे जूते' निबंध में परसाई जी ने व्यंग्य किया हैः

1
धार्मिक पाखंड एवं अंधविश्वास पर
2
राजनैतिक भ्रष्टाचार पर
3
दिखावे की प्रकृति और अवसरवादिता पर
4
सामाजिक शोषण पर

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