निर्देश: नीचे दिए गये गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा गद्यांश में वर्णित तथ्यों के आधार पर प्रश्न के उत्तर दीजिए।
प्राचीन काल में कागज, कलम और पुस्तकें लेकर पढ़ने-लिखने का अभ्यास करने की बजाय विद्यार्थी का चरित्र गठन करना और जीवन संग्रह में उसे अपना और दूसरों का हित कर सकने योग्य बनाना शिक्षा का मुख्य उद्देश्य था। दूसरा उद्देश्य यह था कि मनुष्य को केवल भौतिकता की तरफ दृष्टी रखने वाला न बनाकर वह उसके जीवन को आध्यात्मिकता की तरफ मोड़ती थी। क्योंकि जो व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों को अपने समान समझकर उनके हित-अनहित का ध्यान न रखेगा वह समाज के लिए कभी श्रेष्ठ नागरिक सिद्ध ना होगा। जो स्वार्थी व्यक्ति भौतिक लाभों को ही सब कुछ समझकर अपनी बुद्धि का उपयोग अपने लिए अधिक से अधिक सामग्री प्राप्त करने और दूसरों को उससे वंचित रखने में करता है वह प्राचीन आदर्श की कसौटी पर निस्संदेह एक पढ़ा-लिखा मूर्ख है तथा उसे सुशिक्षित कहना शिक्षा का अपमान करना ही होगा। प्राचीन शिक्षा पद्धति की एक बड़ी विशेषता सामाजिक समानता का प्रचार भी था। धार्मिक भावना, चरित्र और व्यक्तित्व का विकास करके शिक्षा सामाजिक कर्तव्यों पर बल देती थी। तीन ऋणों (देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण) की कल्पना सामाजिक जीवन को भलीभाँति संपन्न करने के लिए ही की गयी थी। प्रत्येक व्यक्ति से आशा की जाती थी कि वह पढ़कर ब्रह्मचर्य आश्रम के बाद गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट होकर पारिवारिक दायित्वों को पूरा करके समाज की सेवा करे। विद्यार्थी में यह भावना भरी जाती थी कि वह समाज के धन से (भिक्षावृत्ति से) शिक्षा प्राप्त कर रहा है। अतः समाज का उस पर बहुत ऋण है। गुरुकुलों में विद्यार्थियों को हर दर्जे की सादगी से रहना पड़ता था। जिससे गरीब-अमीर का अन्तर शिक्षा काल में तो समाप्त ही हो जाता था। ब्रह्मचर्य के पालन के उद्देश्य से विद्यार्थियों को सब प्रकार की तड़क-भड़क की पोशाक, तेल-फुलेल, सुगन्धित उबटन तथा श्रृंगार-सामग्री से दूर रहना पड़ता था। भोजन के लिए गाँव के किसी गृहस्थ के यहाँ से भिक्षा माँग कर लाना ब्रह्मचारियों के लिए नियम रखा गया था। इससे एक ओर से विद्यार्थी के ह्रदय में नम्रता तथा विनय का भाव उत्पन्न होता था। वहीं दूसरी ओर अपने समाज का ऋणी और उसका एक अंग समझने लगता था और भविष्य में समाज की सेवा करना उसका कर्तव्य हो जाता था। इस प्रकार के वातावरण में नितांत गरीब बालक भी उच्च शिक्षा भी सहजता से प्राप्त कर लेते थे। कृष्ण और सुदामा तथा राजा द्रुपद तथा द्रोणाचार्य का एक साथ मित्र रूप में शिक्षा प्राप्त करना इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली इस दृष्टी से बड़ी ही दूषित हो गयी है। कालेजों की शिक्षा बहुत ही खर्चीली हो गई है और वहाँ के ज्यादातर छात्र ऐसे बने-ठने तथा फैशन के पुतले रहते हैं कि किसी गरीब घर के लड़के का वहाँ पहुँच सकना भी असंभव होता है। अगर ऐसा कोई विद्यार्थी किसी की सहायता से अथवा स्वयं ट्यूशन आदि करके वहाँ पढ़ने के लिए पहुँच भी गया तो वह सदा अपने-आप को नीचा पाता है। ऐसी स्थिति का जल्दी से निवारण करना अनिवार्य है।