Comprehension Passage
सत्य अपना पूरा मूल्य चाहता है। इसके साथ समझौता नहीं हो सकता। साहित्य के चरम सत्य को पाने के लिए भी उसका पूरा-पूरा मूल्य चुकाना ही समीचीन है। जो लोग पद-पद पर सहज और सीधे साधनों की दुहाई दिया करते हैं, शायद किसी बड़े लक्ष्य की बात नहीं सोचते। मनुष्य को उसके उच्चतर लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए उसके प्रतिदिन के व्यवहार में आने वाली वृत्तियों के साथ सुलह करने से काम नहीं चलेगा। कठोर संयम और त्याग द्वारा ही उसे बड़ा बनाया जा सकेगा। जो बात एक क्षेत्र में सत्य है। वह सभी क्षेत्रों में सत्य है-साहित्य में, भाषा में, आचार-विचार में, सर्वत्र। भाषा को ही लीजिए। मनुष्य अपने आहार और निद्रा के साधनों को जुटाने के लिए जिस भाषा का व्यवहार करता है वह उसकी अनायास लब्ध भाषा है, परंतु यदि उसे इस धरातल से ऊपर उठाना है तो उससे से काम नहीं चलेगा। सहज भाषा आवश्यक है। पर सहज भाषा का मतलब है सहेज को महान बनाने वाली भाषा, रास्तेमें बटोरकर संग्रह की हुई भाषा नहीं। 

सहज भाषा का मतलब क्या है? 

1
सहेज को महान बनाने वाली भाषा 
2
आम आदमी की भाषा 
3
बोलचाल की भाषा 
4
पढ़े लिखे लोगों की भाषा 

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