नीचे दिये गए गद्यांश को पढ़कर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
मनुष्य की जययात्रा ! क्या मनुष्य ने किसी अज्ञात शत्रु को परास्त करने के लिए अपना दुर्द्धर रथ जोता है? मनुष्य की जययात्रा ! क्या जानबूझकर लोकचित्त को व्यामोहित करने के लिए वह पहले ही जैसा वाक्य बनाया गया है? मनुष्य की जययात्रा का क्या अर्थ हो सकता है? परंतु मैं पाठकों को किसी प्रकार के शब्द-जाल में उलझाने का संकल्प लेकर नहीं आया हूँ। मुझे यह वाक्य सचमुच बड़ा बल देता है। न जाने किस अनादि काल के एक अज्ञात मुहूर्त में यह पृथ्वी नामक ग्रहपिंड सूर्यमंडल से टूटकर उसके चारों ओर चक्कर काटने लगा था। मुझे उस समय का चित्र कल्पना के नेत्रों से देखने में बड़ा आनंद आता है। उस सद्यस्फुटित धरित्री-पिंड में ज्वलंत गैस भरे हुए थे। कोई नहीं जानता कि इन असंख्य अग्निगर्भकणों में से किनमें जीवतत्व का अंकुर वर्तमान था। शायद वह सर्वत्र परिव्याप्त था।