हेडमास्टर ने लपककर मेरी गर्दन दबोच ली। उनकी उँगलियों का दबाव मेरी गर्दन पर बढ़ रहा था । जैसे कोई भेड़िया बकरी के बच्चे को दबोच कर उठा लेता है । कक्षा से बाहर खींच कर उसने मुझे बरामदे में ला पटका । चीख कर बोले, "जा लगा पूरे मैदान में झाड़... '। भयभीत होकर मैंने तीन दिन पुरानी वही शीशम की झाड़ू उठा ली । मेरी तरह ही उसके पत्ते सूख कर झड़ने लगे थे । सिर्फ बची थी पतली-पतली टहनियाँ । मेरी आँखों से आँसू बहने लगे थे। रोते-रोते मैदान में लगाने लगा । स्कूल के कमरे की खिड़की-दरवाजों से मास्टरों और लड़कों की आँखें छिप-छिप कर तमाशा देख रही थी । मेरा रोम-रोम यातना की गहरी खाई में लगातार गिर रहा था। मेरे पिताजी अचानक स्कूल के पास से गुजरे । मुझे स्कूल के मैदान में झाड़ू लगाता देख कर ठिठक गए । बाहर से ही आवाज देकर बोले, "मुंशीजी, यो क्या कर रहा है ?" वे प्यार से मुझे मुंशीजी कहा करते थे। उन्हें देखकर मैं फफक पड़ा। वे स्कूल के मैदान में मेरे पास आ गए। मुझे रोता देखकर " मुंशीजी रोते क्यों हो ? ठीक से बोल क्या हुआ है ?" बोले, रोज मेरी हिचकियाँ बँध गई थीं । हिचक - हिचक कर पूरी बात पिताजी को बता दी कि तीन दिन से झाडू लगवा रहे हैं । कक्षा में पढ़ने भी नहीं देते। पिताजी ने मेरे हाथ से झाड़ू छीन कर दूर फेंक दी । उनकी आँखों में आग की गर्मी उतर आई थी । हमेशा दूसरों के सामने कमान बने रहने वाले पिताजी की लंबी-लंबी घनी मूँछें गुस्से से फड़फड़ाने लगी थीं । चीखने लगे, “कौन सा मास्टर है वो, जो मेरे लड़के से झाड़ू लगवावे है ....."। पिताजी की आवाज पूरे स्कूल में गूँज गई थी, जिसे सुनकर हेडमास्टर सहित सभी मास्टर बाहर आ गए थे। कलीराम हेडमास्टर ने गाली देकर मेरे पिताजी को धमकाया। लेकिन पिताजी पर धमकी का कोई असर नहीं हुआ । उस रोज जिस साहस और हौसले से पिताजी ने हेडमास्टर का सामना किया, मैं उसे कभी भूल नहीं पाया।
उपर्युक्त गद्यांश के अनुसार प्रश्नों का सही उत्तर दें-