यूरोप में 'यथार्थवाद' का जन्म एक प्रकार से 'स्वच्छन्दतावाद' के विरोध में हुआ। स्वच्छन्दतावादी रचनाकार वास्तविक जगत से परे कल्पनालोक में विचरण करते थे। उनकी रचनाओं में अलौकिक तत्व अधिक होते थे। उनके पात्र महिमामंडित होते थे। उनके कार्यकलाप अविश्वसनीय, अवास्तविक और स्वच्छन्द होते थे। उसकी प्रतिक्रिया में इस भौतिक जगत के वास्तविक जीवन के चित्रण की प्रवृत्ति ने 'यथार्थवाद' को जन्म दिया। ऐसा माना जाता है कि यथार्थवादी कला का आरंभ 1856 ई. में फ्रेंच लेखक फ्लाबेयर की प्रसिद्ध रचना 'मादाम बावेरी' के प्रकाशन से हुआ। यद्यपि फ्लाबेयर अपनी रचना पर कोई ऐसा लेबुल लगाने के पक्ष में नहीं थे। इसके बाद बाल्ज़ाक और ज़ोला ने इस आन्दोलन को आगे बढ़ाया। इन लोगों ने जिस यथार्थवाद को प्रश्रय दिया वह 'प्रकृतवाद' कहा गया। ये लोग प्रकृति के सत्य को विशेष महत्व देते थे। प्रकृति का सारा सौन्दर्य प्रत्यक्ष और निरावृत्त है। प्राकृतिक जीवन में कोई आवरण नहीं है, इसलिए इन लोगों ने मानव-जीवन को भी उसकी नग्न वास्तविकता में चित्रित किया। उन्नीसवीं शती के अन्तिम चरण में फ्रांस में ही 'यथार्थवाद' की इस प्रवृत्ति का विरोध होने लगा। इसके बाद यथार्थवादी कला का विकास रूप में लक्षित होता है। दास्तोवस्की के प्रथम उपन्यास 'पुअर पीपुल' को यथार्थवादी उपन्यास माना गया। इसके बाद रूस में ही टालस्टॉय, गोगोल और गोर्की ने यथार्थवादी कला को विकसित किया। गोर्की की कृतियों में यथार्थवाद का जो रूप लक्षित किया गया, उसे सामाजिक यथार्थवाद कहा गया।
उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्न का उत्तर बताइये: