'धरती पर प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। पर्यावरण के असंतुलित होने के अनेक घातक परिणाम होंगे जो धरती पर अनेक समस्याओं को जन्म देंगे। पहली समस्या है - ईंधन - लकड़ी या कोयले के दहन से वातावरण में कार्बन ऑक्साइड गैस की बढ़ती हुई मात्रा । यह धरती गर्म हो रही है। ऐसा अनुमान है कि इस शताब्दी के अंत तक तापमान 1.5 डिग्री और 4 डिग्री सेंटीग्रेड के बीच बढ़ जाएगा। इससे उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की बर्फ पिघल जाएगी और समुद्र का जल स्तर इतना ऊँचा हो जाएगा कि समुद्र तटीय क्षेत्र जलमग्न हो जाएंगे और इसी के साथ उन भूखंडों की जीव संपदा पानी में डूब जाएगी।
दूसरी बड़ी समस्या है - अंटार्कटिका के ऊपर के आकाश में ओजोन की छतरी में छेद। यह हम सभी जानते हैं कि ओजोन की परत धरती के जीवों की रक्षा घातक अंतरिक्ष किरणों से करती है। पर क्लोरोफ्लोरोकार्बन के लगातार वातावरण में पहुँचने से ओजोन की परत झीनी होती जा रही है और यदि इसी गति से यह कार्बन मुक्त होकर वातावरण में मिलते रहे तो ओजोन की चादर घातक अंतरिक्ष कणों को रोक पाने में सर्वथा अशक्त हो जाएगी। परिणाम यह होगा कि पराबैंगनी किरणें धरती में प्रवेश कर जाएँगी। इससे चमड़ी का कैंसर आम बात होगी। वनस्पतियों और जीव जंतुओं पर भी इसका घातक प्रभाव पड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग की इस समस्या को ख़त्म तो नहीं किया जा सकता किन्तु इसकी वृद्धि को रोक कर इसे सामान्य अवश्य जा सकता है। जैसे- जीवाश्म ईंधन को जलाना बंद करने से हानिकारक गैसें नहीं निकलेंगी। यदि हम अपने घरों और इमारतों को बिजली देने के लिए सौर - ऊर्जा और पवन-ऊर्जा का उपयोग करें तो इससे वातावरण में बहुत कम गर्म गैस उत्पन्न होगी।'