गवरी बाई गुरु-महिमा का वर्णन करते हुए कहती हैं "ज्ञानघटा घेराणी अब देखो,.सतगुरु की कृपा भई मुझ पर शब्द ब्रह्म पहचानी।" गवरी बाई पर गुरुकृपा ऐसी बरसी कि उनके लिए अब भगवान केवल श्री कृष्ण की मूर्ति तक ही सीमित न रहे, गुरु ज्ञान ने उनके अज्ञान-आवरण को चीर डाला और उन्हें घट-घट में परमात्मा के दर्शन होने लगे। वे कहती हैं:
‘पूरे ब्रह्मांड का स्वामी सर्वव्यापक हरि ही है। चौदह भुवनों में बाहर, भीतर सर्वत्र वही समाया हुआ है। चाँद में चैतन्य भी वही है। सूरज में तेज भी वही है। ऐसे हरि को भजे बिना दसों दिशाएँ सूनी लगती हैं। हे प्रभु ! तुम्हारा न कोई निश्चित रूप है, न रंग, न वर्ण है। तुम ॐकारस्वरूप हो, तुम निराकार रूप हो । न तुम माया हो न कर्म । उस प्रकार गवरीबाई लिखती हैं कि उनके गुरु के उपदेशों से उन्हें ज्ञान का प्रकाश प्राप्त हुआ है। उस प्रकाश से अज्ञान का अंधकार समाप्त हो गया है।