तीखे खाने की वजह से मेरी नाक और आंखें बहने लगीं,उसने बिना ध्यान दिये बदस्तूर बोलना जारी रखा- ``बहुत पहले, जिस साल यहां छोटी माता फैली थी, उसी साल जाने कहां से चली आई थी साब ये कुरजां डाकण। जब आई थी तब सबसे यही कहती थी कि रावले में उसका धणी, ठाकुर साब के यहां दो साल का बंधक मजूर बनके आया था...दो साल बीत गए, लौट के घर नहीं पहुंचा है। रावले में किसी ने घुसने नहीं दिया, ठाकर सा ने कहलवा दिया के उनके तो...कोई बंधक मजूर नहीं है। कोई कहता जासूस था, कोई समगलर बताता...जिसे बी. एस. एफ. वालों ने मार गिराया। पहले गांव के मंगनियार लोगों की ढाणियों की तरफ अपने गोद के बच्चे के साथ रहने लगी। जड़ी - बूटियां देती औरतों को, इलाज करती। विस्बास जीत लिया लुगाइयों का। मनमाना पैसा और घर - घर जाकर अनाज मांगने लगी तो औरतों ने मना करना सुस्र् किया... फिर तो जो इसे मना करे उसके घर में बच्चे बीमार पड़ जाएं, मौत हो जाये। मेरी ही औरत के जब तीसरा बच्चा होने को था तो हम देवता के यहां से लड़का होने की भभूत लाए... ये बेकूफ सामने पड़ गयी...कि तीसरी भी लड़की पैदा हो गयी। एक बार तो, यहां के रावले में ये डाकण जबरदस्ती पहुंच गयी।