निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दें।
भक्ति आंदोलन तथा सूफी-साधना दोनों ने ही ईश्वरीय प्रेम के द्वारा मानवता का पथ प्रशस्त किया है। भारतीय संस्कृति एवं साधना के संपर्क में आने पर सूफियों ने इस संस्कृति से बहुत कुछ ग्रहण कर लिया। नाथ पंथियों, साधकों, योगियों आदि का प्रभाव तो इन पर जगह-जगह देखा जा सकता है। भावों के मिश्रण के साथ ही उन्होंने भारतीय भाषाओं एवं बोलियों को भी अपनाया। बाबा फरीद ने पंजाबी साहित्य को अनूठी देन दी है। कुतुबन, मंझन, जायसी और नूर मुहम्मद जैसे सूफी कवियों का साहित्य अवधी भाषा में है।भारतवर्ष में सूफी परंपरा, खासतौर पर चिश्ती-सिलसिला, काफी हद तक अपने विचारों में एक सच्ची रहस्मय अनुभूति तथा ईश्वरीय प्रेम भावना पर केंद्रित रहा है। चिश्ती सिलसिले को भारत में स्थापित करने का श्रेय ख्वाजा मुइनउद्दीन चिश्ती को है। इस सिलसिले के सूफी न केवल राजशासन से संबंध नहीं रखते थे अपितु वे आर्थिक सहायता तथा जागीरों आदि को भी स्वीकार नहीं करते थे। इसके विपरीत सुहरावर्दी सिलसिले के सूफी साधकों ने आरंभ से ही राज्य से अपना संबंध रखा। उनका विचार था कि सत्ता के सहयोग तथा आर्थिक सहायता से वे समाज के दुखी व्यक्तियों के कष्टों का निवारण कर सकते है साथ ही शेख बहाउद्दीन ज़कारिया का विचार था कि इससे वह शासकों की विचारधारा तथा नीतियों में परिवर्तन भी ला सकते हैं। सुहरावर्दी सूफी अच्छे कार्यों मे लगाने हेतु धन संचय को भी बुरा नहीं समझते थे। वह चिश्तियों के समान शारीरिक कष्ट को उचित नहीं मानते थे।