Comprehension Passage
लोभ चाहे जिस वस्तु का हो जब वह बहुत बढ़ जाता है तब उस वस्तु की प्राप्ति, सानिध्य या उपभोग से जी नहीं भरता। मनुष्य चाहता है कि वह बार-बार मिले या बराबर मिलता रहे। धन का लोभ जब रोग होकर चित्त में घर कर लेता है, तब प्राप्ति होने पर भी और प्राप्ति की इच्छा बराबर बनी रहती है। जिससे मनुष्य सदा आतुर और प्राप्ति के आनंद से विमुख रहता है। जितना नहीं है उतने के पीछे जितना है उतने से प्रसन्न होने का उसे कभी अवसर ही नहीं मिलता। उसका सारा अंतःकरण सदा अभावमय रहता है। उसके लिए जो है वह भी नहीं है। असंतोष अभाव-कल्पना से उत्पन्न दुख है, अतः जिस किसी में यह अभाव-कल्पना स्वाभाविक हो जाती है सुख से उसका नाता सब दिन के लिए टूट जाता है। न किसी को देखकर वह प्रसन्न होता है और न उसे देख कर कोई प्रसन्न होता है। इसी से संतोष सात्विक जीवन का अंग बताया गया है।
असंतोष किस प्रकार का दुःख माना गया है?
1
धन प्राप्त न होने का दुःख
2
संतोष प्राप्त न होने का दुःख
3
अभाव-कल्पना से उत्पन्न दु:ख
4
लोभ की पूर्ति न होने का दुःख