Comprehension Passage
हमारे समाज में बहुत से लोग भाग्यवादी होते हैं और सब कुछ भाग्य के सहारे छोड़कर कर्म से विरत हो बैठते हैंI ऐसे व्यक्ति ही समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर नहीं होने देतेI आज तक किसी भाग्यवादी ने संसार में कोई महान कार्य नहीं कियाI बड़ी-बड़ी खोजें, बड़े-बड़े अविष्कार और बड़े-बड़े निर्माण के कार्य श्रम के द्वारा ही संपन्न हो सके हैंI हमारी साधन-सम्पन्नता, हमारी प्रतिभा हमें केवल प्रेरित कर सकती है, हमारा पथ-प्रदर्शन कर सकती है जबकि लक्ष्य तक हम श्रम द्वारा ही पहुँचते हैंI जब हम परिश्रम से अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, तो हमारे मन को अलौकिक आनंद मिलता हैI ऐसे व्यक्ति को धर्म के बाह्याचारों के अनुसरण की आवश्यकता नहीं पड़ती, उसका परिश्रम ही उसकी पूजा हैI यदि हम अपने कार्य में ईमानदारी से श्रम नहीं करते, तो हमारे मन में एक प्रकार का भय समाया रहता हैI कभी-कभी तो हम ग्लानि का भी अनुभव करते हैंI
गद्यांश का केन्द्रीय भाव क्या है?
1
मनुष्य को परिश्रमी होना चाहिए
2
मनुष्य को भाग्यवादी होना चाहिए
3
मनुष्य को अधिक पूजापाठ करना चाहिए
4
मनुष्य को साधन संपन्न बनना चाहिए