दिए गए गदयांश को ध्यानपूर्वक पढ़े और प्रश्न के उत्तर दे।
एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि आरम्भ में प्रेमचंद अपने उपन्यास पहले उर्दू में लिखते थे और फिर स्वयं उनका हिंदी रूपान्तर करते थे। ‘सेवासदन', 'प्रेमाश्रम' और 'रंगभूमि' क्रमश: ' बाज़ारे हुस्न', 'गोशाए आफिमत' और 'चौग़ाने हस्ती' नाम से उर्दू में लिखे गये थे, किंतु प्रकाशित यह पहले हिंदी में हुए । मूल रूप से हिंदी में लिखित उनका पहला उपन्यास 'कायाकल्प' है। हिंदी उपन्यास को प्रेमचंद की देन अनेकमुखी है। प्रथमत: उन्होंने हिंदी - कथा - साहित्य को 'मनोरंजन' के स्तर से उठाकर जीवन के साथ सार्थक रूप में जोड़ने का काम किया। चारों ओर फैले हुए जीवन और अनेक सामयिक समस्याओं - पराधीनता, ज़मींदारों, पूंजीपतियों और सरकारी कर्मचारियों द्वारा किसानों का शोषण, निर्धनता, अशिक्षा, अंधविश्वास, दहेज की कुप्रथा, घर और समाज में नारी की स्थिति, वेश्याओं की जिंदगी, अस्पृश्यता, साम्प्रदायिक वैमनस्य आदि-नें उन्हें उपन्यास लेखन के लिए प्रेरित किया था। 'सेवासदन' में उनका ध्यान मुख्यतः विवाह से जुड़ी समस्याओं- तिलक-दहेज की प्रथा, कुलीनता का प्रश्न, विवाह के बाद घर में पत्नी का स्थान आदि - और समाज में वेश्याओं की स्थिति पर रहा। 'निर्मला' में दहेज प्रथा और वृद्ध-विवाह से होने वाले पारिवारिक विघटन तथा विनाश का चित्रण है। कृषक जीवन की समस्याओं के चित्रण का प्रथम प्रयास 'प्रेमाश्रम' में लक्षित हुआ और उसे पूर्णता प्राप्त हुई 'गोदान' में। वैसे प्रेमचंद ने मान्य रूप से अपने प्राय: सभी उपन्यासों में और विशेष रूप से 'रंगभूमि' और 'कर्मभूमि' में ग्रामीणों की स्थिति का चित्रण किया है; पर 'गोदान' को तो ग्रामीण जीवन और कृषि संस्कृति का महाकाव्य ही कहा जा सकता है। महात्मा गाँधी से प्रभावित होने के कारण ही नहीं, अपनी मानवतावादी दृष्टि के कारण भी देश की साम्प्रदायिक समस्या प्रेमचंद की चिंता का मुख्य विषय थी। इस समस्या को 'सेवासदन' और विशेष रूप से 'कायाकल्प' में प्रस्तुत किया गया है। विधवा-विवाह का प्रश्न 'प्रतिज्ञा' में उठाया है। समाज में हरिजनों की स्थिति और उनकी समस्याओं का चित्रण 'कर्मभूमि में मिलता है।