निम्नलिखित गद्यांश को पढ़ें और प्रश्न का उत्तर दें:
निराला ने 'अप्सरा'(1931) से कथा-मंच पर प्रवेश किया। इसके पूर्व वह कवि के रूप में खासी ख्याति और प्रतिष्ठा अर्जित कर चुके थे। उपन्यास की ओर उनके आने का कारण जैसा कि इस दौर के उनके एक पत्र से संकेत मिलता है, कुछ 'कमाई' का विचार था क्योंकि कविता से तब यह आशा नहीं की जा सकती थी। 'अप्सरा' से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि लेखक एक अनिर्णय और द्वंद्व की स्थिति में है । एक ओर उसके आगे प्रेमचंद का व्यापक फलक पर जन-जीवन को चित्रित करने का आग्रह था तो दूसरी ओर सद्यः प्रस्फुटित नायिका प्रधान मनोवैज्ञानिक उपन्यासों का प्रेम सम्बंधों की सूक्ष्मताओं और प्रगाढ़ अनुभूतियों के अंकन का आकर्षण भी कम नहीं था। अपनी नायिका अप्सरा को वह, नामों का उल्लेख किये बिना भी, इन मनोवैज्ञानिक नायिकाओं से स्पर्धा भाव से देखते ही हैं। निराला के उपन्यास, आगे चलकर, नारी-मुक्ति के सवाल को बहुत गम्भीरता पूर्वक उठाते है और दलित एवं वंचित वर्ग को केंद्र में रखकर विकसित होते हैं। उपन्यास के क्षेत्र में निराला की सक्रियता का काल दो दशकों में फैला हुआ है- 1931 से 1951 के बीच। इस बीच उन्होंने 'अप्सरा' (1931), 'अलका' (1933), 'प्रभावती' (1936), 'निरूपमा' (1936), 'कुल्ली भाट' (1939), 'बिल्लेसुर बकरिहा' (1942), आदि उपन्यास लिखे और उपन्यासकार के रूप में अपनी एक सुनिश्चित पहचान बनाई। निराला ने 'अप्सरा' की नायिका कनक को अप्रतिम सौंदर्य और असाधारण वैदुष्य को मिलाकर गढ़ा है। तत्कालीन भारतीय समाज स्त्री के लिए इतनी स्वतंत्रता देने को तैयार नहीं था, इसलिए कदाचित निराला ने अपनी नायिका की कल्पना एक वेश्या-पुत्री के रूप में की है। भले ही एक आत्मसजग और सामाजिक रूढ़ियों के विरोध में खड़ी युवती की अपनी परिकल्पना में निराला बहुत स्पष्ट न हों, लेकिन जो भी छिटपुट संकेत यहाँ उपलब्ध हैं उनसे निराला के रचनात्मक लक्ष्य को समझ पाना कठिन नहीं है। उपन्यास की कथा-भूमि कलकत्ता है। इस समाज के कलुष से स्त्रियों की मुक्ति ही निराला का मुख्य रचनात्मक लक्ष्य है।