निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
भारत बहुजातीय देश है। यहाँ किसी जाति की अपनी विशेषताओं के साथ सामान्य राष्ट्रीय विशेषताओं पर ध्यान देना उचित है। किन्तु राष्ट्रीय एकता का अर्थ जातीय विशेषताओं का लोप नहीं होता ।
हिन्दी जाति की संस्कृति भारतीय संस्कृति का ही एक अंग है और उसके संदर्भ में ही उसका विकास और महत्व समझा जा सकता है। जब वेद मंत्र रचे गये, तब उस युग के आस पास सिन्धु घाटी की महान् सभ्यता विकसित हुई थी। संस्कृत के विशाल वाङ्मय के एक छोर पर तक्षशिला में पाणिनि हैं और दूसरे छोर पर केरल में शंकराचार्य हैं। आधुनिक भाषाओं में लगभग चौथी ईस्वी शताब्दी से अब तक तमिल साहित्य की अटूट गौरवशाली परंपरा है। जातीय चेतना का प्रसार महाराष्ट्र में सन्तों के द्वारा हुआ और समर्थ गुरु रामदास ने समस्त मराठी भाषियों से एक झंडे के नीचे संगठित होने को कहा। जन साधारण को अपना आधार बनाकर शिवाजी ने भारतीय युद्ध कौशल में क्रान्तिकारी परिवर्तन किया और उन्होंने संसार में सबसे पहले छापेमार लड़ाई का विकास किया। महाराष्ट्र में उन्होंने मराठीभाषी जाति की जातीय राज्यसत्ता स्थापित की। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बंगाल ने भारतीय नवजागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निबाही ।
किसी भी बहुजातीय देश के सामाजिक सांस्कृतिक इतिहास में सभी जातियों का योगदान एक सा नहीं होता यद्यपि वे एक दूसरे को प्रभावित करती रहती हैं। 1857 के स्वाधीनता संग्राम का केन्द्र हिन्दी प्रदेश था, इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उसका राष्ट्रीय महत्व नहीं था या दूसरे प्रदेशों में उसके प्रति सहानुभूति नहीं थीं या वहां साम्राज्य विरोधी संघर्ष न हुए थे।
सन् सत्तावन की राज्यक्रान्ति में पंजाब, सीमान्त प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्णाटक, हैदराबाद और विशाल हिन्दी भाषी प्रदेश की जनता ने भाग लिया। इन प्रदेशों में क्रान्ति का विकास एक सा नहीं था, न हो सकता था।
जातियों के विचार से स्वाधीनता संग्राम में हिन्दुस्तानियों की भूमिका प्रमुख थी। हिन्दी प्रदेश में नवजागरण 1857 के स्वाधीनता संग्राम से शुरू होता है।