निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
नाटक साहित्य की वह विधा है जिसका परीक्षण रंगमंच पर होता है और रंगमंच युग विशेष की जनरुचि और तत्कालीन आर्थिक व्यवस्था के आधार पर निर्मित होता है। रंगमंचीय गत्यात्मकता ही नाटक का मूल मर्म है। नाटक की भाषा हरकत की भाषा होती है। अभिनय के लिए प्रयोग किये जानेवाले शब्द या वाक्य तभी सार्थक माने जाते हैं, जब वे कायिक, वाचिक, सात्विक एवं आहार्य अभिनय को उकसाते या प्रेरित करते है। दूसरी विधाओं में रचनाकार वर्णनात्मक, चित्रात्मक, एवं संगीतात्मक भाषा के जरिए ही विषयवस्तु को प्रकट करता है, किंतु नाटक में अभिनय के जरिए विषयवस्तु को प्रत्यक्ष घटित होते हुए दिखलाया जाता है। मध्ययुग के उत्तरार्द्ध में ब्रजभाषा हिंदी में भी कुछ ऐसे नाट्क प्रणीत हुए जिनकी मूल प्रकृति तो काव्यपरक ही है, किंतु संवाद-शैली में रचे जाने के कारण उन्हें नाटक की संज्ञा दे दी गयी है। रामायण महानाटक (प्राणचंद चौहान), करुणाभरण (लछिराम), शकुंतला (नेवाज) आदि ऐसे ही नाटक हैं। मध्यकाल में लोकधर्मी नाट्य परम्पराएँ पूरे भारत में अनेक नाम रूपों में व्याप्त रही हैं। उत्तर भारत में 'रास' और 'नौटंकी', मध्यभारत और राजस्थान में 'ख्याल', गुजरात में ‘भवाई’, बिहार में ‘कीर्तनिया' और 'अंकिया', दक्षिण में 'यक्षगान' के रूप में लोक नाट्य परंपरा बराबर जीवित रही है। भारतेंदु के अनुसार विशुद्ध नाटक रीति का ध्यान रखकर हिंदी का सर्वप्रथम मौलिक नाटक 'नहुष' उनके पिता गोपालचंद (गिरधर दास) द्वारा सन् 1859 ई. में लिखा गया था। नया नाटक आज़ादी के बाद सपनों के क्रमश: टूटने से उत्पन्न विवशता और निराशा की संवेदना का नाटक है। यह उल्लेखनीय है कि सन् 1954-55 के बाद सामान्य शिक्षित जनमानस आंतरिक विघटन एवं घुटन का अनुभव करने लगा। मानव-मन में पलने वाली आशाएँ टूटीं, मोह भंग की स्थिति पैदा हुई । नयी पीढ़ी में कुंठा, वर्जना, घुटन, संत्रास, निराशाएँ एवं आशंका ने जन्म लिया। आज़ादी के बाद के नाटकों का मुख्य स्वर यही है।