“टप टप बूंद परहिं जस ओला । बिरह पवन होइ मारै झोला ।” पंक्ति में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने रेखांकित अंश से आशय ग्रहण किया है।

1
वात के प्रकोप से अंग का सुन्न हो जाना । 
2
विरह रूपी पवन से राख बन उड़ जाना।
3
कृशकाय होने के कारण असंतुलित होना ।
4
शरीर का अत्यधिक कम्पित होना ।

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