निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर निम्न प्रश्न के उत्तर दीजिए
सत्य और नितिनिष्ठा द्वारा संसार का नियंत्रण करने वाली ऐसी शक्ति जो व्यक्ति की आकांक्षाओं में विद्यमान रहती है, वही ईश्वर हैं। दार्शीनेकप्लेटो की मान्यता लगभग ऐसी ही थी, उनका कहना था कि ईश्वर अच्छाई का विचार है। संसार के प्रत्येक व्यक्ति, यहां तक की जीव जन्तुओं तक को भी अच्छाई की चाहत रहती है। जहां अच्छाई होती है, वहीं आनंद रहता है। अच्छाई शरीर और सौंदर्य की जो संयम और सदाचारों के द्वारा सुरक्षित हो, अच्छाई और वस्त्रों जो धोने और स्नान करने से सुरक्षित हो अच्छाई वातावरण की, घर, गांव और नगरों की जो स्वच्छता और सफाई द्वारा सुरक्षित हो। इस संसार में हम सर्वत्र अच्छाई का दर्शन करके प्रसन्नता का अनुभव ही प्रभुत्व और आनंद का स्त्रोत हैं। यदि हम ईश्वर को माने तो उसे अच्छाई का वह बीज मानना होगा जो अतिशय दिव्य, मनोरम और बहुत ही प्यारा लगता है। न्यूटन और आइन्स्टीन जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिकों ने सृष्टि के प्रत्येक क्रियाकलाप में उस सर्वव्यापी परम चेतना के अस्तित्व को स्वीकारा है जो समय, स्थान, गति और कारण से परे हैं। उनके अनुसार सृष्टि की समस्त व्यवस्था सुनियोजित रूप से उस चेतन सत्ता के द्वारा संचालित है जिसका अस्तित्व सिद्ध कर सकना भौतिकी के नियमों और वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा संभव नहीं उसे ज्ञान के रूप में, विचार के रूप में अच्छाईयों के समुच्चय के रूप में ही जाना जा सकता है। विचार दिखाई नहीं देता पर हम हर पल अनुभव करते है। हमारे जीवन की सारी क्रियाशीलता विचारों की ही देन हैं, विचार मरे की शरीर भी मर गया। मृत्यु के अंतिम क्षण तक विचार प्रक्रिया का बने रहना यह बताता है कि विचार ही विश्वव्यापी चेतना या ईश्वर है। विचार कभी नष्ट नहीं होते। या यों कहें कि भगवान का स्वरूप, गुण और विचारमय ही हो सकता है चाहे वह किसी शक्ति कणों के रूप में हो अथवा प्रकाश रूप में पर विचारों का अस्तित्व संसार में है अवश्या हम सदैव ही उनसे प्रेरित, प्रभावित होते रहते है। विचारों को कोई भी व्यक्ति अपना नहीं कह सकता। मनोविज्ञानी फ्रायड ने भी अंततः कहा था विचार अवचेतन मन से आते हैं और मनुष्य का उस पर कोई नियंत्रण नहीं, वह कोई स्वतंत्र सत्ता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक हीगल ने भगवान को सामान्य इच्छाओं से ऊपर उठा हुआ, इच्छाओं को भी नियंत्रण में रखने वाला परम विचार अब्सोल्यूट आइडिया बताया है जिस प्रकार प्रत्यक्ष में देखने से हमारा मस्तिष्क एक प्रकार से विचारों का पुंज है और इसी के किसी कोने से विचारों का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है, इसी तरह समूचे विश्व में फैले विचार किसी केन्द्रीभूत सत्ता से प्रस्फुटित हो रहे है। जिस प्रकार सूर्य में संलयन क्रिया होती रहती और प्रकाश तरंगे निःसृत होती रहती हैं उसी प्रकार संसार के किसी भाग से नियमित विचारों की निर्झर झरता रहता है, उस केन्द्रीभूत सत्ता का नाम उन्होंने परमेश्वर बताया।