"अब आप इस बसन्त को ही लो,

यह दिन को ताँत की तरह तानता है

पेड़ों पर लाल - लाल पत्तों के हजारों सुखतल्ले 

धूप में, सीझने के लिए

लटकाता है"

उपर्युक्त पंक्तियों से ध्वनित होता है कि:

1
मोचीराम मोची नहीं, शायर है।
2
मोचीराम नये बिंबों और प्रतीकों में बात करता है।
3
मोचीराम बसंत का बयान अपने पेशे की भाषा में करता है।
4
मोचीराम जिंदगी को किताबी ढंग से जीता है।

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