"दिन के उजाले में वह गवाह थी, मुजरिम थी, हर चीज का उससे तकाजा अब इस अकेलेपन में कोई गिला नहीं, उलाहना नहीं, सब खींचातानी खत्म हो गई है, जो अपना है, वह बिलकुल अपना सा हो गया है, जो अपना नहीं है, उसका दुख नहीं, अपनाने की फुरसत नहीं" यह उद्धरण किस कहानी से लिया गया है।

1
आकाश दीप
2
अपना अपना भाग्य
3
परिंदे
4
सिक्का बदल गया

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