निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
भक्ति आन्दोलन पहले शहरों में बसनेवाले लोगों, खासकर छोटे-छोटे व्यापारियों, जुलाहों, टोकरी बनानेवालों और भिश्तियों जैसे लोगों के बीच से शुरू हुआ था । किन्तु सत्रहवी शताब्दी तक वह किसानों में भी व्याप्त हो गया। इसने एक जन आन्दोलन का रूप धारण कर लिया और मुगल शासन तथा सामन्ती सरदारों के विरूद्ध कभी-कभी सशस्त्र विद्रोहों के रूप में भी प्रकट हुआ। सत्रहवीं शताब्दी में दिल्ली में सिक्खों का जो आन्दोलन चला और मथुरा में किसानों का जो सशस्त्र विद्रोह हुआ, उसमें कुछ सामान्य कड़ियां तथा प्रेरणा स्रोत थे। पंजाब में मुसलमान सामन्तों के खिलाफ किसानों के संघर्ष में भक्ति आन्दोलन ने सक्रिय भूमिका अदा की। महाराष्ट्र में एक पूर्ण तूफान के रूप में शिवाजी के नेतृत्व में चलनेवाले मुक्ति आन्दोलन में मराठी कवि तुकाराम की भूमिका कोई मामूली भूमिका नहीं थी। एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस आन्दोलन के नेता अपनी कवितायें और अपने गीत फारसी और संस्कृत जैसी दुरूह और क्लिष्ट भाषाओं में नहीं, वरन जनता की भाषाओं में रचते थे। इससे राष्ट्रीय इकाइयों तथा राष्ट्रीय भाषाओं के विकास को प्रोत्साहन मिला, जो भारतीय राष्ट्र के विकास की एक ऐतिहासिक प्रक्रिया थी ।
भक्ति आन्दोलन ने देश के भिन्न-भिन्न भागों में भिन्न-भिन्न मात्राओं में तीव्रता और वेग ग्रहण किया। यह आन्दोलन विभिन्न रूप में प्रकट हुआ। किन्तु कुछ मूलभूत सिद्धांत ऐसे थे जो समग्र रूप से पूरे आन्दोलन पर लागू होते थे पहले, धार्मिक विचारों के बावजूद जनता की एकता को स्वीकार करना; दूसरे, ईश्वर के सामने सबकी समानता, तीसरे, जाति प्रथा का विरोध; चौथे, यह विश्वास कि मनुष्य और ईश्वर के बीच तादात्म्य प्रत्येक मनुष्य के सद्गुणों पर निर्भर करता है, न कि उसकी ऊंची जाति अथवा धन-सम्पत्ति पर; पांचवें, इस विचार पर जोर कि भक्ति ही आराधना का उच्चतम स्वरूप है; और अन्त में, कर्मकाण्डों, मूर्ति पूजा, तीर्थाटनों और अपने को दी जानेवाली यंत्रणाओं की निन्दा । भक्ति आंदोलन मनुष्य की सत्ता को सर्वश्रेष्ठ मानता था और सभी वर्गगत एवं जातिगत भेदभावों तथा धर्म के नाम पर किये जानेवाले सामाजिक उत्पीड़न का विरोध करता था।