और सहसा मैंने पाया कि मैं खुद अपने सवालों के 
सामने खड़ा हूँ और 
उस मुहावरे को समझ गया हूँ 
जो आजादी और गांधी के नाम पर चल रहा है 
जिससे न भूख मिट रही है, न मौसम बदल रहा है। 

उपर्युक्त पंक्तियों में ध्वनित हुआ है कि-

1
आजादी के अर्थ को कवि समझ गया है। 
2
कवि अपने में मग्न है। 
3
कवि ने आजादी के नाम पर शासन की मनमानी को दिखाया गया है। 
4
कवि जीवन को मजे से जी रहा है। 

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