"ज्ञानी ब्रह्म के जिस स्वरूप का अपने चिंतन के बल से उद्घाटन करके तटस्थ हो जाता है उसी स्वरूप को भावुक भक्त लेता है और ध्यान या भावमग्नता के समय उसमें अपनी सारी सत्ता को - हृदय, प्राण, बुद्धि, कल्पना, संकल्प इत्यादि सारी वृत्तियों को – समाहित और घनीभूत करके बड़े वेग के साथ लीन कर देता है।"

उपर्युक्त कथन किसका है?

1
रामविलास शर्मा 
2
हजारीप्रसाद द्विवेदी 
3
नामवर सिंह 
4
रामचन्द्र शुक्ल 

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