निम्नलिखित परिच्छेद को पढ़ें और अगले पाँच प्रश्नों का उत्तर दें :
ब्रिटिश शासन की स्थापना से पूर्व भारत की अपनी स्वतंत्र अर्थव्यवस्था थी । यद्यपि जन-सामान्य की आजीविका और सरकार की आय का मुख्य स्रोत कृषि था, फिर भी देश की अर्थव्यवस्था में विभिन्न प्रकार की विनिर्माण गतिविधियाँ हो रही थीं । सूती व रेशमी वस्त्रों, धातु आधारित तथा बहुमूल्य मणि-रत्न आदि से जुड़ी शिल्पकलाओं के उत्कृष्ट केंद्र के रूप में भारत विश्व भर में सुविख्यात हो चुका था । भारत में बनी इन चीजों की विश्व के बाज़ारों में अच्छी सामग्री के प्रयोग तथा उच्च स्तर की कलात्मकता के आधार पर बड़ी प्रतिष्ठा थी । औपनिवेशिक शासकों द्वारा रची गई आर्थिक नीतियों का ध्येय भारत का आर्थिक विकास नहीं बल्कि अपने मूल देश के आर्थिक हितों का संरक्षण और संवर्धन ही था। इन नीतियों ने भारत की अर्थव्यवस्था के स्वरूप के मूल रूप को बदल डाला । भारत, इंग्लैंड को कच्चे माल की पूर्ति करने तथा वहाँ के बने तैयार माल का आयात करने वाल देश बन कर रह गया। स्वाभाविक ही था कि औपनिवेशिक शासकों ने कभी इस देश की राष्ट्रीय तथा प्रति व्यक्ति आय का आकलन करने का भी ईमानदारी से कोई प्रयास नहीं किया। कुछ लोगों ने निजी स्तर पर आकलन किए, पर उनके अनुमानों में विसंगतियाँ और आपसी मतभेद भी रहे हैं। इन आकलनकर्ताओं ने दादाभाई नौरोजी, विलियम डिग्बी, फिंडले शिराज, डॉ. वी.के.आर.वी. राव तथा आर. सी. देसाई प्रमुख रहे हैं। औपनिवेशिक काल के दौरान डॉ. राव द्वारा लगाए गए अनुमान बहुत महत्त्वपूर्ण मान जाते हैं। फिर भी, सभी अध्ययनकर्ता एक बात पर सहमत रहे हैं कि 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारत की कुल वास्तविक उत्पादन की संवृद्धि दर 2 प्रतिशत से कम ही रही है तथा प्रति व्यक्ति उत्पादन वृद्धि दर तो मात्र आधा प्रतिशत ही रह गई ।