निम्नलिखित परिच्छेदों को पढ़िए और उनके नीचे आने वाले प्रश्नांशों के उत्तर दीजिए। इन प्रश्नांशों के लिए आपके उत्तर केवल इन परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए।
प्राकृतिक वरण (नैचुरल सिलेक्शन) पृथ्वी पर भावी पर्यावरणों का पूर्वानुमान नहीं कर सकता। इसलिए वर्तमान जीव-समुच्चय पर्यावरणीय महाविपत्तियों के लिए, जो जीवन की राह में खड़ी हैं, पूरी तरह कभी भी तैयार नहीं हो सकते। इसका परिणाम यह है कि वे प्रजातियाँ विलुप्त हो जाएँगी जो पर्यावरणीय प्रतिकूलता से पार नहीं पा सकतीं। उत्तरजीविता की इस विफलता का उत्तरदायी, आधुनिक शब्दों में, उन जीनोम को कहा जा सकता है, जो भूवैज्ञानिक विक्षोभ या जैविक दुर्घटनाओं (संक्रमण, रोग आदि) को झेल पाने में असमर्थ हैं। पृथ्वी पर जीवों के विकास (ईवोल्यूशन) में प्रजातियों का विलुप्त होना एक प्रमुख विशेषता रही है। वर्तमान में पृथ्वी पर एक करोड़ तक प्रजातियाँ हो सकती हैं, तथापि 90% से अधिक प्रजातियाँ, जो कभी पृथ्वी पर थीं, अब विलुप्त हो चुकी हैं। एक बार फिर सृष्टि-शून्यवादी सिद्धांत इस बात का संतोषजनक समाधान देने में असफल हो जाते हैं कि क्यों एक दिव्य सृष्टिकर्ता पहले तो लाखों प्रजातियों का सृजन करता है और फिर उन्हें समाप्त हो जाने देता है। विलुप्त जीवन के बारे में डार्विनवादी व्याख्या एक बार फिर सरल, सुचारु और एकदम युक्तियुक्त हो जाती है—जीवों का जीवन उन पर्यावरणीय या जैविक हमलों की क्रिया के रूप में विलुप्त हो जाता है, जिनके सामने उनका वंशानुक्रम उनको पर्याप्त रूप से तैयार नहीं समझता है। इसलिए, तथाकथित डार्विनवादी विकास सिद्धांत वास्तव में सिद्धांत है ही नहीं। विकास होता है—यही सत्य है। विकास की क्रियाविधि (डार्विन ने प्राकृतिक वरण प्रस्तुत किया) का पर्याप्त समर्थन वैज्ञानिक आँकड़ों से हो जाता है। वास्तव में, अभी तक डार्विन के दो केन्द्रीय विचारों में से किसी का भी किसी जन्तुवैज्ञानिक, वनस्पतिवैज्ञानिक, भूवैज्ञानिक, जीवाश्मीय, आनुवंशिक या भौतिक साक्ष्यों ने खंडन नहीं किया है। यदि धर्म का विचार न करें, तो डार्विन के नियम ठीक-ठीक कोपरनिकस, गैलिलियो, न्यूटन और आइंस्टाइन द्वारा प्रस्तावित नियमों की तरह ही स्वीकार्य हैं—कि ये प्राकृतिक नियम-समुच्चय हैं जो भूमंडल में प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या करते हैं।