नीचे दिए गए परिच्छेद को पढ़िए और प्ररिच्छेद के नीचे आने वाले प्रश्‍नांशों के उत्तर दीजिए। इन प्रश्‍नांशों के लिए आपके उत्तर केवल इन परिच्छेद पर ही आधारित होने चाहिए।

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (कोड) के अनुसार भारतीय बैंकों के दिवालिया मामलों का समाधान किया जाए, तो वह अनर्जक परिसंपत्ति (एन.पी.ए.) को कुछ सीमा तक नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है | राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण द्वारा किए जाने वाले समाधानों की गति धीमी होने के बावजूद, यह संहिता भावी ऋण-चक्रों में बैंक बहियों को शोधित (क्लीन अप) करने में सहायक हो सकती है । सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का पुनः पूँजीकरण भी बैंकों के गुंजाइश पूँजी (कैपिटल कुशन) को बढ़ाने और उन्हें अधिक ऋण देने और आर्थिक गतिविधि को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित करने में सहायक हो सकता है। किंतु, अशोध्य कर्ज़ का समाधान और पुनः पूँजीकरण, इस समाधान का एक अंगमात्र ही हैं, क्योंकि वे उस अनियंत्रित ऋण को रोकने में बहुत कम ही सहायक हो सकते हैं, जिसने भारतीय बैंकिंग प्रणाली को उसकी वर्तमान दयनीय अवस्था में ला खड़ा किया है। जब तक अधारणीय ऋण की समस्या के समाधान के लिए प्रणालीगत सुधार नहीं किए जाते हैं, तब तक भावी ऋण-चक्र बैंकिंग प्रणाली पर दबाव डालते रहेंगे।

उपर्युक्त परिच्छेद के अनुसार, निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा सर्वाधिक तर्कसंगत, विवेकपूर्ण व्यावहारिक सुझाव को बेहतर दर्शाता है ?  

1
बैंकों द्वारा दिए जाने वाले ऋण का सघन अनुवीक्षण (मॉनीटर) और सघन विनियमन केंद्र सरकार को करना चाहिए।
2
ब्याज की दरें निम्न रखी जानी चाहिए, जिससे कि अधिक ऋण देने, ऋण वृद्धि को प्रोत्साहित करने और इसके जरिए आर्थिक गतिविधि को बढावा देने के लिए बैंकों को प्रेरित किया जा सके।
3
कई बैंकों का कुछ बड़े बैंकों में विलय करना ही बैंकों को लाभकारी बनाने और उनके खराब निष्पादन को रोकने का दीर्घकालिक समाधान है।
4
अशाेध्य ऋण की समस्या के दीर्घकालिक समाधान के रूप में, भारतीय बैंकिंग प्रणाली में संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं।

Sponsored

hivanix.in

Visit

This quiz is brought to you by hivanix.in

🌐 Web App Development

Quick Navigation