नीचे दिए गए अनुच्छेद को पढ़िए और अपनी समझ के आधार पर प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
जापानी लोग जब अपने स्कूली जीवन को याद करते हैं तो स्कूल का मध्याह्न भोजन उनका सामान्य विषय होता है। जापान में शिक्षा, संस्कृति, खेल, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय (मेक्स्ट) में एक छोटा-सा म्यूजियम भी है जहाँ प्रत्येक पीढ़ी के स्कूल के विशिष्ट मध्याह्न भोजन की प्रतिकृति तैयार की जाती है। इस प्रदर्शनी को आगंतुकों की प्रशंसा मिलती है जो इस प्रकार की टिप्पणी करते हैं जैसे "यह मेरे बच्चे के साथ बातचीत के लिए बहुत अच्छा है" और "इससे मेरी उन दिनों की यादें ताजा हो गई हैं"। जापान में “एक ही बर्तन से भोजन करना" मित्रता और संबंधों में प्रगाढ़ता का द्योतक है और इस वाक्यांश को स्कूल के मध्याह्न भोजन के मामले में पूरे देश में लागू किया जा सकता है। यह लेख स्कूल के मध्याह्न भोजन सेवा की जाँच करता है जिससे जापानी लोग दिल से जुड़े होते हैं।
आधुनिक स्कूलों में मध्याह्न भोजन सेवा को समग्रतः स्कूल प्रशासन के अंतर्गत बच्चों को दिए जाने वाले किसी आहार के रूप परिभाषित किया जाता है, परंतु जापान में इसकी शुरूआत 19वीं सदी के अंत में निर्धन बच्चों को मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराए जाने के स्थानीय नागरिक प्रयासों के रूप में हुई। बाद में, विश्व युद्ध से पहले और उसके दौरान शिक्षा मंत्रालय ने स्कूलों में मध्याह्न भोजन की सिफारिश, स्कूली बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार के रूप में की थी। अधिक सुगम्य शहरों से शुरूआत करते हुए स्कूलों में मध्याह्न भोजन, जहाँ तक संभव हो अधिक से अधिक बच्चों तक पहुँचाने के लक्ष्य के साथ, दिया जाने लगा, किंतु स्कूलों में मध्याह्न भोजन कानून, जिसकी घोषणा और अधिनियमन 1954 में, दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात् पुनर्निर्माण के अंतर्गत की गई, के बाद ही जापानी स्कूलों में मध्याह्न भोजन कार्यक्रम को वैधानिक प्राधिकार प्राप्त हुआ और इसे देश भर में प्रदान किया जाने लगा।
जापान में धर्मार्थ स्कूलों में मध्याह्न भोजन सेवा की शुरूआत 1889 से देखने को मिलती है जब सुरुओका सिटी, यमागाटा प्रिफेक्चर में प्राथमिक विद्यालयों में निर्धन बच्चों को बौद्ध परिसंघ द्वारा मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराया जाता था। मीजी (1868 – 1912) और टाइसो (1912 - 1926) काल में अधिकांश स्कूलों में मध्याह्न भोजन निर्धन बच्चों तक ही सीमित था और उसके प्रभाव ने बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित किया। अकिता, शिजुओका, इवाते और अन्य प्रिफेक्चरों में भी कई उदाहरण देखे गए है जिनका वित्तपोषण स्कूल या जिला बजट तथा निजी दान से होता था। भोजन में सामान्यत: सफेद चावल का गोला और मिसो (सोयाबीन पेस्ट) के साथ कभी-कभी आचारी सब्जियाँ या गर्म सूप होता था। एक वृत्तचित्र फोटो में इस भोजन को लेने वाले बच्चे स्कूल की रसोई के कोने में उसे खाते हुए दिखाई दे रहे हैं जबकि उनके संभ्रात साथी अपने घर में बने पैक लंच को कक्षा में खा रहे हैं।