स्वास्थ्य योजना एवं विकास समिति की रिपोर्ट, जिसे भोरे समिति रिपोर्ट, 1946 के नाम से जाना जाता है, ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा योजना पर आधारित थी। सर जोसेफ भोरे ने ऐसी सिफारिशें कीं जो भारत में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के संगठन का आधार बनीं। उन्होंने चिकित्सा पद्धति के सामाजिक उन्मुखीकरण के साथ-साथ उच्च स्तर की सार्वजनिक भागीदारी की वकालत की। भोरे समिति की सिफारिशों में सभी प्रशासनिक स्तरों पर निवारक और उपचारात्मक सेवाओं का एकीकरण, ग्राम स्वास्थ्य समितियों का गठन, सामाजिक चिकित्सक का प्रावधान, स्वास्थ्य सेवाओं के विकास के लिए अंतर-क्षेत्रीय दृष्टिकोण, सामाजिक चिकित्सकों को तैयार करने के लिए निवारक और सामाजिक चिकित्सा में तीन महीने के प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं। भोरे समिति की रिपोर्ट से प्रेरणा लेते हुए, देश की समस्त ग्रामीण आबादी को एकीकृत प्रोत्साहन, निवारक, उपचारात्मक और पुनर्वास सेवाएं प्रदान करने के लिए 1952 में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थापना की शुरुआत की गई थी। स्वास्थ्य सर्वेक्षण एवं योजना समिति की रिपोर्ट या मुदालियर समिति की रिपोर्ट, 1962 में प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य संवर्ग के विकास पर जोर दिया गया था। इसने सहायक नर्स दाई के रूप में जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की भी सिफारिश की थी। चड्ढा समिति की रिपोर्ट (1963) में मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम अपनाने का आह्वान किया गया था। मुखर्जी समिति की रिपोर्ट (1966) ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में प्रदान की जाने वाली बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का ब्यौरा तैयार किया था। जंगलवाला समिति की रिपोर्ट (1967) ने सभी प्रकार की स्वास्थ्य सेवाओं के एकीकरण की सिफारिश की थी। इन समितियों के अलावा, 1977 में शुरू की गई ग्रामीण स्वास्थ्य योजना के कार्यान्वयन ने स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे और सेवाओं के सुधार में योगदान दिया।