निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए तथा प्रश्न का उत्तर दीजिए:
चन्द्रगुप्त के पौत्र अशोक (273-236 ई. पू.) जिसे देवानांपिय (देवताओं को प्रिय) एवं पियदसि (प्रियदर्शी) कहा गया है। भ्रातृ-युद्ध में विजयी होकर पाटलिपुत्र के सिंहासन पर विराजमान हुए। सिंहासनारूढ़ होने के नौ वर्ष पश्चात कलिङ्ग का युद्ध जीतकर उन्होंने उस राज्य को पूर्णता प्रदान की जिसे उन्होंने अपने पूर्वजों से प्राप्त किया था।
कलिङ्ग युद्ध की सम्राट के ऊपर भयावह प्रतिक्रिया हुई। निस्सन्देह यह प्रतिक्रिया बुद्ध की शिक्षाओं के कारण हुई थी। अशोक को भारी संख्या में मारे गए अथवा बंदी हुए लोगों पर खेद था। उन्हें धर्मपरायण पुरुषों और स्त्रियों की दशा का दुःख था जिन पर व्यक्तिगत हिंसा, मृत्यु अथवा अपने प्रियजनों से बिछुड़ने का आघात पड़ा था, उन्होंने शासन के उपकरण के रूप में युद्ध के उपयोग को हमेशा के लिए तिलांजलि देते हुए कहा कि 'यदि उसे कोई नुकसान पहुँचाता है तो वह वहाँ तक सब कुछ सहन करेगा जो सहनीय होगा।" कलिंग युद्ध के बाद उन्होंने धर्म विजय (अर्थात धर्म के द्वारा विजय) के पथ का अनुसरण किया। उन्होंने धर्म के प्रचार के लिए धर्म प्रचारकों का एक वर्ग (नेटवर्क) स्थापित किया। उन्होंने घोषणा की कि सभी लोग मेरी सन्तान है। उन्होंने यह भी घोषणा की, कि जो छोटा सा प्रयास मैं करता हूँ वह किस लिए है? इसलिए कि मैं प्राणियों के ऋण से मुक्त हो सकूँ, मैं कुछेक को इस धरती पर प्रसन्न कर सकूँ और वे इस लोक में स्वर्ग प्राप्त कर सकें। सम्राट ने अपने आप को संसार के नैतिक एवं भौतिक कल्याण के अभिभावक की भूमिका में स्वीकार किया।