निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और प्रश्न के उत्तर दीजिए।
1980 के दशक के आरंभ में, पॉल रोमर ने अर्थशास्त्रियों के बीच पारंपरिक विचार को चुनौती दी कि उत्पादकता संवृद्धि बहिर्जात थी. इसका अभिप्राय यह था कि अर्थव्यवस्था में किसी अन्य चीज़ से इसको प्रभावित नहीं किया जा सकता था। उन्होंने अंतर्जात वृद्धि सिद्धांत को प्रतिपादित किया जो स्वीकार करता है कि शोधार्थियों के प्रयासों के परिणामस्वरूप प्रौद्योगिकीय परिवर्तन होता है और उद्यमी आर्थिक प्रोत्साहन की प्रतिक्रिया देते हैं। यह प्रौद्योगिकीय परिवर्तन राष्ट्र के विकास का मुख्य संवाहक है। रोमर ने इस बात पर बल दिया कि कर नीति, बुनियादी शोध वित्तपोषण और शिक्षा जैसे कारक दीर्घकालिक आर्थिक संभावनाओं को प्रबलता से प्रभावित कर सकते हैं।
रोमर को वर्ष 1990 का पेपर आर्थिक वृद्धि को समझने में निर्णायक बिंदु है। उन्होंने प्रेरक वृद्धि के विचारों के महत्व का पर विशेष उल्लेख किया और उस पर विशेष बल दिया कि शास्त्रीय अर्थशास्त्र के मानक वस्तुओं के विपरीत विचार गैर-प्रतिद्वंद्वि वस्तु हैं। विचारों की इस गैर- प्रतिद्वंद्विता इसके प्रतिफल में वृद्धि करती है जैसा कि समान/ वही विचार का बिना क्षरण बारंबार प्रयोग किया जा सकता है। रोमर का तर्क था कि प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि प्रति व्यक्ति विचारों में वृद्धि की तुलना विचारों के कुल भंडार में वृद्धि को झूठलाती है।
इसके अतिरिक्त, शेयर का योगदान (कार्य) यह सुझाव दिया कि बिना बाह्यताओं के साथ परिपूर्ण प्रतिस्पर्धात्मक संतुलन में संसाधनों के इष्टतम आवंटन को विकेंद्रीकृत नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा नए विचारों की खोज के लिए आपूर्ण प्रतिस्पर्धा और बाह्यताएँ नवाचार और वृद्धि को बढ़ाने में संभावतः महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं।