नीचे दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और फ्रस्त्रों के उत्तर दीजिए:
"आधारभूत/मूल विशेषता" के सिद्धांत में अंतर्निहित सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि यद्यापि यह साधारण विधायन के अधिनियमन में विधायिका के अधिकार को परिसीमित नहीं करता है, लेकिन यह सांविधायी निकाय को परिसीमित करता है। साथ ही यह भी स्वीकार किया जाता है कि संविधायी निकाय एक परवर्ती 'संप्रभू' प्राधिकरण है जबकी विधायिका संप्रभू नहीं है। इसका तात्पर्य यह है कि किसी साधारण विधि की वैधता अवधारित करने के क्रम में न्यायालय केवल संविधान के स्पष्ट उपबंधों अथवा उनके आवश्यक निहितार्थ की जाँच कर सकता है किन्तु संविधान संशोधन अधिनियम की विधि-मान्यता को चुनौती दिए जाने की दशा में संविधान के सुव्यक्त उपबंधों से पीछे या उससे आगे भी जा सकता है। न्यायालय यह ज्ञात करने के लिए कि प्रश्नगत संशोधन उन सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं जिन्हें संविधान के विशिष्ट उपबंधों के पीछे 'प्रतिमान' (मानक- नॉर्म) का निर्माण करने वाला माना जाता है, संक्षेप में यह 'संविधान की भावना' अथवा नैसर्गिक विधि के सिद्धांतों को पुन:स्थापित करने का गैर- तार्किक प्रयास है, यद्यापि यह गुप्त तरीके से स्वयं संविधान को ही परिसीमित करना है जबकी उसे खुले रूप से साधारण विधान को परिसीमित करनेवाला करार देकर अस्वीकृत कर दिया गया था।