Comprehension Passage
मोटे तौर पर विधि के सिद्धांत में अभिलाक्षणिक विशेषताएं निहित होती हैं जो कि विधि और समान विधि प्रणाली और विधि के मूल तत्व का विश्लेषण जो इसे विधि बनाता है और जो इसे नियमों के अन्य रूपों और मानकों से अलग करता है, के लिए आवश्यक हैं तथा जिसे अन्य सामाजिक प्रक्रम के दृष्टि वैद्यानिक प्रणाली के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता है। वास्तुतः यह संभव नहीं है कि ‘विधि क्या है' का रूढ़ उत्तर दिया जाए और बहुत से प्रश्नों के उत्तर दिए जाए जो इसके मूल प्रकृति के बारे में है। विधि सिद्धांत की प्रकृति को अध्ययन में विधि के विशिष्ट गुण जो अन्य सिद्धांतों के प्रकाश में प्राप्त होते हैं और विष्य पर प्रमुख प्रकटन के संगत गुण और दोष की जाँच निहित होते हैं। इसी क्रम में 'विधि सिद्धांत' एक छोर पर दर्शन से जुड़ा है तो दूसरे छोर पर राजनीतिक विचार धारा से जुड़ा है जो कि इसका द्वितीयक अंग है.... कभी कभी ज्ञान का सिद्धांत और राजनीतिक विचार धारा एक संगत प्रणाली में निहित होती है और निश्चित रूप में यह सच है कि कुछ विधि दाशर्निक पहले दार्शनिक रहे हैं और संयोगवश विधिवेत्ता बने और अन्य राजनीतिक सर्वप्रथम विधिवेत्ता रहे क्योंकि उन्होंने विधिक रूप में अपने राजनीतिक विचारों को व्यक्त करने के लिए इसकी आवश्यकता महसूस की। संक्षेप में 19वीं शताब्दी से पहले विधि सिद्धांत दर्शन, धर्म, आचार या राजनीति का मुख्य रूप से प्रतिफल है। विधि दर्शन का अस्तित्व मुख्यतः पेशेवर वकीलों के विधि कार्य का सामाजिक न्याय की समस्या के साथ टकराव से हुआ है। आधुनिक विधिवेत्ता विधि सिद्धांत, जो विद्वान दार्शनिक से किसी मामले में कम नहीं है तथा यह उस परम विश्वास पर आधारित है जो विधि के बाहर से आता है।
कानून को समाजिक विज्ञानों, तत्व मीमांसा, आचार और नैतिक कारकों से अवश्य मुक्त रहना चाहिए। इस सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया था ?
1
आस्टिन
2
पाउण्ड
3
केल्सेन
4
सलमोण्ड