निम्नांकित गद्यांश को पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
भारत में मानव अधिकारों का संरक्षण और प्रवर्तन भारत के संविधान में “मूल अधिकार" (भाग II) के रूप में सिविल और राजनीतिक अधिकार तथा “राज्य के नीति-निदेशक तत्व " (भाग IV) के रूप में "आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार" तक सीमित हैं और इसमें संविधान के भविष्यगत परिप्रेक्ष्य (विज़न) तथा संविधान के निर्माताओं देश में किस प्रकार के समाज की स्थापना करना चाहते थे, इस संबंध में चर्चा की गई है। संविधान निर्माता राजनीतिक प्रक्रिया और निर्णय लेने में प्रत्येक व्यक्ति को एकसमान भूमिका दिए जाने के विषय में बिल्कुल स्पष्ट थे। उन्होंने न केवल सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का उपबंध किया अपितु राजनीतिक प्रक्रिया में एकसमान रूप से प्रतिस्पर्धा करने में अक्षम व्यक्तियों के लिए निर्वाचन निकायों में सीटों के नियतन (आवंटन) या आरक्षण का भी प्रावधान किया। उस प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी के साथ-साथ गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए जिसे वे केवल राजनीतिक प्रक्रिया पर ही नहीं छोड़ना चाहते थे या भविष्य के लिए स्थगित नहीं करना चाहते थे, उन्होंने मूल अधिकारों का भी उपबंध किया जिसमें आरंभ में ही उन उपबंधों को भी शामिल किया गया था जो परवर्ती काल (बाद में) में राज्य के नीति निदेशक तत्व बन गए। मूल अधिकार और राज्य की नीति के निदेशक तत्व जिन्हें संविधान की अन्तरात्मा के रूप में विशिष्ट पहचान दी गई है तथा उनके मध्य सांमजस्य और संतुलन को संविधान की मूलभूत संरचना के तत्व के रूप में मान्यता दी गई है। भारत के संविधान का भाग चार क जिसका शीर्षक 'मूल कर्त्तव्य' (अनुच्छेद 51 क) है, इसमें उपबंध है कि प्रत्येक नागरिक को राष्ट्र के साथ साथ अन्य नागरिकों के प्रति अवश्य अपने कत्तव्य का निर्वाह करना चाहिए।
गद्यांश को सावधानी पूर्वक पढ़ें और प्रश्नों का उत्तर दें।
यह धारणा कि प्रत्येक नागरिक की राष्ट्र तथा सभी नागरिक के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए भारत के संविधान के किस भाग में उल्लिखित है?