निम्न अनुच्छेद को ध्यानपूर्वक पढ़े और अपनी समझ के आधार पर संबंधित प्रश्नों के उत्तर दें :
प्रयोक्ता शिक्षा का प्रयोग पुस्तकालय अनुदेश, पुस्तकालय अभिन्यास और ग्रंथ सूची अनुदेश के लिए अदल-बदल कर किया जाता है। नीलमेघन ने प्रयोक्ता शिक्षा, प्रयोक्त अभिन्यास और प्रयोक्ता सहायता के बीच अंतर को प्रतिपादित किया है। प्रयोक्ता शिक्षा एक व्यापक सेवा है। यह सूचना का पता लगाने, छंटाई करने तथा पुनः व्यवस्थित करने में प्रयोक्ता को आत्म निर्भर बनाने की प्रक्रिया भी है। इस प्रक्रिया की दो रणनीतियाँ हैं - पहला सामान्य उद्भासन के लिए और दूसरा विषय विशेष के मामले में संदर्भ ग्रंथों के अनुदेश के लिए। पुस्तकालय का पहला दौरा सामान्य प्रकार का हो सकता है किन्तु इसके लिए प्रयोक्ता से बार- बार मीटिंग करनी पड़ सकती है।
सन् 1850 के दशक में यू. एस. के पुस्तकालयाध्यक्षों ने पुस्तकालय उपयोग पर संरक्षकों को अनुदेश दिये। सैमुअल ग्रीन ने 1870 के दशक में सार्वजनिक पुस्तकालय में संदर्भ डेस्क की शुरुआत करने का प्रयास किया, सन् 1920 के दशक में लुइस शौर के पुस्तकालय कॉलेज आन्दोलन और सन् 1960 के दशक में पैट्रीसिया नेप मानटीथ कॉलेज कार्यक्रम का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है। सन् 1949 युनाइटेड किंगडम पुस्तकालय संघ के विश्वविद्यालय और अनुसंधान अनुभाग द्वारा प्रस्तावित तीन चरण वाले प्रयोक्ता शिक्षा कार्यक्रम भील का पत्थर साबित हुए। रंगनाथन ने प्रयोक्त सुविधा संदर्भ लाइब्रेरियन के रूप में मध्यस्थ की भूमिका का वानि किया है। बून, जालब्राम्ट और स्टोवेंशन, होपकिंस, राबर्ट्स और ब्लांडी तथा अन्य विद्वानों ने व्यापक ऐतिहासिक मूल्यांकन किया है। हालां कि इस दिशा में प्रगति काफी धीमी रही है। इसका आंशिक कारण सेवा क्षेत्र में इसकी स्थिति को परिभाषित करना रहा है। सूचनात्मक कार्यों या संदर्भ सेवा में इसकी उपयोगिता समाप्त हो गयी है। व्याख्यान, दौरा और सेमीनार पारंपरिक विधियाँ रही हैं, जबकि योजनाबद्ध शिक्षण, मशीनों के जरिये शिक्षण, श्रव्य दृश्य माध्यमों और कंप्यूटर के जरिए शिक्षण की विधियों का हाल ही में उद्भव हुआ है। प्रयोक्ता शिक्षण मात्र लाइब्रेरी दौरा या ब्रोशर नहीं है बल्कि इसमें आंकड़ों की खोज (स्थानीय तथा वैश्विक) तथा प्रयोक्ता को इतना सक्षम बनाना है कि वह दूसरे पर कम से कम निर्भर रहे, भी शामिल है।
आजकल विभिन्न प्रकार के माध्यमों का प्रयोग किया जाता है। एक-एक कर निर्देश देना सरल है किन्तु इसमें व्यय अधिक होता है। अनौपचारिक दौरों से जानकारी देना परंपरागत तथा प्रभावी होता है। परंतु इसमें समय बहुत लगता है और यह प्रकिया इतनी आम हो चुकी है कि प्रयोक्ता के लिए यह उक्ताहट भरा हो जाता है। मुद्रित सामग्री (लीफलेट, हैंडआउट) के सेवाओं, उपकरणों और रणनीतियों की व्याख्या की जाती है किन्तु इनमें बार-बार संशोधन की आवश्यकता होती है और हो सकता है इनका उपयोग भी न हो। पोस्टर, चित्रांकन आदि शिक्षण कौशल हो सकते हैं किन्तु इसके लिए मध्यस्थ की आवश्यकता होती है। कार्य पुस्तकों में दर्शकों की समबद्धता रहती है जिससे हरेक व्यक्ति सीख सकता है, तथा शिक्षक भी शिक्षण के प्रभाव को जान सकता है।