नीचे दिए गए अनुच्छेद को पढ़िए और अपनी समझ के आधार पर प्रश्न उत्तर दीजिए:
जब आप दुनिया की सैर करेंगे, तो आपको भिन्न स्थानों पर जीवन स्तर में विस्मयकारी भिन्नता देखने को मिलेगी। संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान अथवा जर्मनी जैसे समृद्ध देशों की औसत आय भारत, इन्डोनेशिया अथवा नाइजीरिया जैसे निर्धन देशों की तुलना में दस गुना है। आय में यह भारी अंतर जीवन की गुणवत्ता में भारी अंतर को परिलक्षित करता है। अपेक्षाकृत अमीर देशों के लोगों को बेहतर पोषाहार, अधिक सुरक्षित आवास, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ तथा सुदीर्घ जीवन प्रत्याशा हैं। उनके पास अधिक संख्या में गाड़ियाँ, टेलीफोन तथा टेलीविजन हैं। एक देश के भीतर भी समय के साथ-साथ जीवन स्तर में परिवर्तन देखा गया है। पिछली दो शताब्दियों में संयुक्त राज्य अमेरिका में औसत आय, जिसकी गणना प्रति व्यक्ति वास्तविक जी. डी. पी. (सकल घरेलू उत्पाद) द्वारा की जाती है, में प्रतिवर्ष 2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यद्यपि 2 प्रतिशत छोटा प्रतीत हो सकता है, वृद्धि की इस दर का अभिप्राय है कि औसत आय प्रति 35 वर्षों में दुगुनी हो जाती है। इस वृद्धि के कारण ही अमरीकी अपने माता-पिता, दादा-दादी और परदादा परनाना आदि की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक समृद्ध हैं।
एक देश की तुलना में दूसरे देश की विकास दर में काफी अन्तर पाया जाता है। हाल के इतिहास में, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे कुछ पूर्व एशियाई देशों में लगभग 7 प्रतिशत की वार्षिक आर्थिक विकास दर रही है। इस दर के कारण प्रत्येक 10 वर्ष में उनकी औसत आय दुगुनी हो जाती है। कतिपय अनुमानों के अनुसार, पिछले दो दशकों में चीन में प्रतिवर्ष 12 प्रतिशत की उच्च विकास दर दर्ज की गई है। अगर किसी देश की विकास दर ऐसी तेज रहे, तो एक पीढ़ी में वह सर्वाधिक निर्धन देश से सर्वाधिक धनी देश की श्रेणी में आ सकता है। विलोमतः कुछ उप-सहारा अफ्रीकी राष्ट्रों की औसत आय कई वर्षों से रुकी हुई रही है। जिम्बाब्वे सर्वाधिक कम विकास दर वाले राष्ट्रों में रहा है। वर्ष 1991 से 2011 तक इसकी प्रति व्यक्ति की आय में 38 प्रतिशत गिरावट आई है।
ये विभिन्न अनुभव क्या संकेत करते हैं? अमीर देश अपना जीवन स्तर किस प्रकार बनाएँ रख सकते हैं? निर्धन देशों को किस प्रकार की नीतियों का अनुसरण करना चाहिए ताकि उनका अधिकाधिक त्वरित विकास हो और वे विकसित दुनिया में शामिल हो पायें? ये वृहत् अर्थशास्त्र में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं। जैसा कि नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री रॉबर्ट लुकास ने कहा है, "इस प्रकार के प्रश्नों में मानवीय कल्याण के परिणाम बहुत चौंकाने वाले हैं। अगर कोई व्यक्ति एक बार इन विषयों पर सोचना शुरू कर दे तो किसी और विषय पर सोच पाना बहुत कठिन होता है।"